गुरु पूर्णिमा पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वर मिश्र 'पंकज' का हुआ सम्मान
- अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, भोपाल इकाई के तत्त्वावधान में गुरु पूर्णिमा व्याख्यान, गुरु सम्मान एवं पावस गोष्ठी सम्पन्न
भोपाल, 29 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, भोपाल इकाई के तत्त्वावधान में बुधवार को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित गुरु सम्मान समारोह, व्याख्यान एवं पावस गोष्ठी में गुरु तुल्य वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वर मिश्र 'पंकज' का सम्मान किया गया।
इस अवसर पर उन्होंने भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा विषय पर ओजस्वी एवं प्रेरक व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में उपस्थित रचनाकारों ने गुरु महिमा एवं पावस ऋतु पर आधारित रचनाओं का प्रभावपूर्ण पाठ किया।
अपने उद्बोधन में डॉ. रामेश्वर मिश्र 'पंकज' ने कहा कि गुरु की महिमा अपरम्पार है। गुरु का कार्य साधक को परम तत्व का ज्ञान कराना है, जबकि आचार्य जीवन के व्यवहारिक पक्ष का मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सदैव सदाचार का अनुसरण करना चाहिए। उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिवेश पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज अतिथि की अवधारणा बदल गई है और हमने संबंधियों को ही अतिथि मान लिया है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. राजेन्द्र शर्मा 'अक्षर' ने गुरु की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसी भी कला, विद्या अथवा ज्ञान की प्राप्ति गुरु के बिना संभव नहीं है। उन्होंने अपना गीत सुनाया-
ये घने आषाढ़ के बादल,आज कर देंगे हमें पागल।
द्रोण मिले अर्जुन बन पाया,संदीपनि ने कृष्ण बनाया।
गुरु वशिष्ठ ने नींव रखी तब,विश्वामित्र ने राम बनाया।
कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन देते हुए परिषद् की अध्यक्ष डॉ. नुसरत मेहदी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा भारतीय ज्ञान-परम्परा में गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान का पर्व है। गुरु ही समाज और राष्ट्र के लिए योग्य एवं संस्कारित नागरिकों का निर्माण करता है। उन्होंने कहा कि पावस ऋतु नवसृजन, हरियाली और नई चेतना का संदेश लेकर आती है तथा भारतीय साहित्य में वर्षा ऋतु का सौन्दर्य सदैव सृजन का प्रेरक रहा है। पावस गोष्ठी इसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परम्परा का उत्सव है।
बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए परिषद् की महामंत्री सुनीता यादव ने बताया कि भोपाल इकाई अपने तीन प्रमुख वार्षिक आयोजनों, गुरु पूर्णिमा, नवसंवत्सर (चैत्र प्रतिपदा) एवं शरद पूर्णिमा—के अतिरिक्त वर्षभर विभिन्न साहित्यिक विधाओं पर मासिक गोष्ठियों, साहित्य-संवर्धन यात्राओं, सम्मेलनों एवं प्रतियोगिताओं का नियमित आयोजन करती है।
रचनापाठ के क्रम में सुनीता यादव ने चोंच खोल बैठी आँगन में देखो चिरैया प्यासी है गीत प्रस्तुत किया। डॉ. रंजना शर्मा ने गुरु वंदना गुरु वह दीप है, जो तम को हर ले, ज्ञान-सुधा से जीवन भर दे का पाठ किया। मनीष बादल ने गुरु महिमा पर दोहे सुनाए- अमृत से हैं कम नहीं,गुरु के सात्विक बोल।आँख मूँद पी जाइए,चरणामृत का घोल।
इसी क्रम में वंदना मिश्रा, सीमा अग्रवाल, अशोक कुमार धमनियां, अर्चना मुखर्जी, दिनेश गुप्ता 'मकरंद', बिहारी लाल सोनी, डॉ. वर्षा चौबे, डॉ. प्रतिभा मिश्रा, पुरुषोत्तम तिवारी, आरोही तथा जया आर्य ने गुरु महिमा एवं पावस पर आधारित अपनी रचनाओं का प्रभावपूर्ण पाठ किया। डॉ. वर्षा चौबे ने बेटियों पर अपनी मार्मिक कविता प्रस्तुत की, जबकि डॉ. प्रतिभा मिश्रा एवं पुरुषोत्तम तिवारी ने पावस गीत सुनाकर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर