मप्रः जननायक समारोह में ‘राजा हीराखान सिंह छत्री’ का हुआ मंचन
- मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में आयोजित ‘जननायक समारोह’ संपन्न
भोपाल, 23 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश में गोंड जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं, शौर्यगाथाओं, आध्यात्मिक विश्वासों और जीवन-मूल्यों को जनजातीय आख्यानों एवं नृत्य-नाट्यों के माध्यम से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘जननायक समारोह’ में रविवार शाम समापन दिवस पर ‘राजा हीराखान सिंह छत्री’ का मंचन हुआ
मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, श्यामला हिल्स, भोपाल में आयोजित समारोह के समापन दिवस पर ‘राजा हीराखान सिंह छत्री’ नृत्य-नाट्य प्रस्तुत किया गया। यह गोंड समुदाय के महान योद्धा राजा हीराखान सिंह की शौर्य, संघर्ष, बुद्धिमत्ता और विजय यात्रा की कथा है। लोक आख्यान के अनुसार राजा हीराखान सिंह, राजा कारीकामा के पुत्र थे।
एक प्रसंग में राजा कारीकामा की हत्या राजा तपेसिरिया के सैनिकों द्वारा कर दी जाती है। उनका घोड़ा गिद्ध बाय बछेड़ा राई रोझिन इस घटना का साक्षी बनता है और कारीकामा के राज्य की ओर लौटते समय तपेसिरिया की पुत्री कम्मालहीरो को अपने साथ ले आता है। इसी समय हीराखान सिंह का जन्म होता है। आगे चलकर कम्मालहीरो का विवाह हीराखान सिंह से होता है।
विवाह के बाद जब हीराखान सिंह को अपने पूर्वजों के साथ हुए अन्याय और उनके सिर सिंघोला में टांगे जाने की जानकारी मिलती है, तो वे सत्य और न्याय की खोज में संघर्ष का मार्ग चुनते हैं। वे राजा तपेसिरिया से युद्ध करते हैं और अपने पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता से उसे परास्त कर अपने पूर्वजों का प्रतिशोध लेते हैं। इसके बाद अपने राज्य में लौटकर वे राजकाज संभालते हैं। नृत्य-नाट्य में राजा हीराखान सिंह की जीवटता, साहस, संघर्ष, युद्ध-कौशल, बुद्धिमत्ता और प्रजा के प्रति प्रतिबद्धता को केंद्र में रखते हुए गोंड संस्कृति एवं परंपराओं को मंचीय रूप दिया गया है। 1.30 मिनट की इस प्रस्तुति में 40 से अधिक कलाकारों के सहभागिता की। साथ ही इस नृत्य में लगभग 10 से अधिक दृश्यों को पिरोया गया। प्रस्तुति में गोण्ड जनजातीय समुदाय के पारंपरिक संगीत और नृत्यों का भी समावेश देखने को मिला।
‘राजा हीराखान सिंह छत्री’ का निर्देशन नवीन सिंह तथा संगीत कुलदीप सारवा द्वारा किया गया है। समारोह में मंचित तीनों ही नृत्य -नाट्य प्रस्तुतियों का आलेख योगेश त्रिपाठी-रीवा द्वारा किया गया। समारोह में नाट्य निर्देशक नवीन सिंह का स्वागत सहायक निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी श्री राजीव सक्सेना द्वारा किया गया।
संभावना गतिविधि में नृत्य की प्रस्तुति हुई
इससे पहले मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में रविवार को नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना में गोण्ड जनजातीय घसियाबाजा नृत्य अनेलाल घासी एवं साथी, सिंगरौली एवं सहरिया जनजातीय लहंगी नृत्य रामलखन आदिवासी एवं साथी, श्योपुर द्वारा प्रस्तुति दी गई।
लहंगी नृत्य
सहरिया जनजाति द्वारा श्रावण मास में किया जाने वाला लंहगी समूह नृत्य है। रक्षाबंधन पूर्णिमा के दूसरे दिन भुजरियों का त्यौहार मनाया जाता है। ग्राम में भुजरियों का चल समारोह निकाला जाता है। बांस की टोकनियों में ऊगे गेहूँ के जवारों को महिलाएँ सिर पर धारण करती हैं, यही भुजरियाँ है। भुजरियों में सभी जाति के लोग सम्मिलित होते हैं। भुजरियों के जुलूस के आगे-आगे पुरूषों द्वारा लहंगी नृत्य किया जाता है। नर्तकों के हाथों में डंडे होते हैं। गोल घेरे में एक ढोलक वादक होता है। ढोलक की तीव्र थापों पर नर्तक डंडे लय के साथ लड़ाते चलते हैं, इससे नृत्य की गति बनती है। इस गति के साथ नर्तक विभिन्न समूहन मुद्रा बनाते हैं। सहरिया जनजाति ने भी लंहगी नृत्य अपना लिया है। खासकर युवा सहरिया रक्षाबंधन के अलावा तेजाजी पूजा मेला, एकादशी आदि पर्वो पर लहंगी नृत्य करते हैं।
घसियाबाजा नृत्य
सरगुजा जिले के सुदूर ग्रामीण अँचल में रहने वाले विशेष कर घासी जाति का यह परम्परागत नृतय एवं जीविका का साधन है। इसमें लौहाटी, शहनाई, टिमकी एवं डपला आदि वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण लोक शादी-विवाह एवं तीज त्यौहारों पर इन्हें किराये पर ले जाते हैं। सरगुजा की जनजातियाँ के लिये इस वाद्य पर उतना ही महत्व है, जितना की शहरों की बैण्ड पार्टी का।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर