विशुद्ध प्रेम अपने लिए नहीं रखता कभी कोई चाहना- डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
झाबुआ, 24 सितम्बर (हि.स.)। विशुद्ध प्रेम अपने लिए कभी किसी तरह की चाहना नहीं रखता, वह तो केवल देना ही देना जानता है, किंतु यदि प्रेम सापेक्ष है, तो वह प्रेम नहीं होकर सौदा है, एक व्यापार है, जिससे भाव जगत् में कभी कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। प्रेम अपनी पीड़ा का बखान कर अपने लिए सहानुभूति पाने का साधन नहीं, बल्कि प्रेमास्पद की संभावित पीड़ा से व्यथित हुए हृदय की आंतरिक अनुभूतियों की मौन अभिव्यक्ति है।
उपरोक्त विचार श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में गोपियों की भगवान् श्री कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण, निष्ठा एवं समर्पण और गोपी गीत प्रसंग के उल्लेख के दौरान डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ने व्यासपीठ से व्यक्त किए। डॉ. शर्मा मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के थान्दला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अन्तर्गत आयोजित नौ दिवसीय अनुष्ठान श्रीमद्भागवत सप्ताह महोत्सव के पांचवे दिवस पर गुरुवार को स्थानीय श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में कथावाचन कर रहे थे।
भागवत सप्ताह भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष अष्टमी से आरम्भ हुआ था। अष्टमी को भागवत महात्म्य के वाचन बाद कथा आरंभ हुई, जो कि आज पांचवें दिन में प्रवेश कर गई।
डॉ.उमेशचन्द्र शर्मा ने कथा प्रसंग में गोपियों के श्री कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा कि गोपियां अपने प्रेमास्पद श्री कृष्ण की संभावित पीड़ा से भी इतनी व्यथित हो जाती थी कि उसके स्मरण मात्र से ही उन्हें गहन मानसिक आघात पहुंचता था।
गोपियां कहती है, कृष्ण जब तुम गोएं चराने जाते हो तो हमें इस संभावना से ही चक्कर आने लगते हैं कि कमल से भी कोमल तुम्हारे पांवों में कहीं कोई कंकड़, कांटा न चुभ जाए। श्रीकृष्ण के विरह की व्यथा में व्यथित गोपियां जो श्रीकृष्ण के बिना एक क्षण भी व्यतीत करने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी, उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण का संदेश लेकर आए उद्धव को कहा कि यदि कृष्ण मथुरा में ही प्रसन्न हैं, तो उन्हें कह देना कि वो यहां न आएं।
गोपियों ने अपनी समस्त चित्त वृत्तियों को कृष्ण मय बना दिया था। उन महाभागा गोपांगनाओं ने भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था। उनका अपना ओर अपने लिए कहीं कुछ भी शेष बचा ही नहीं था। ये वही गोपकुमारिकाएं थीं, जिन्होंने अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के लिए ब्रह्म प्राप्ति या ब्रह्म सुख का भी परित्याग कर दिया था. हमारे तो सर्वस्व श्री कृष्ण है, हम किसी ब्रह्म को पाना तो दूर, जानना भी नही चाहती। वे उद्धवजी को कहती है
स्याम तन, स्याम मन, स्याम है हमारो धन,
आठों जाम ऊधो हमे स्याम ही सों काम है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर