जननायक समारोह: जनजातीय संग्रहालय में लौहगुण्डी के शौर्य से जीवंत हुआ गोंडवाना

 






- रविवार को समापन पर गूंजेगी राजा हीराखान सिंह छत्री की गाथा

भोपाल, 22 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में गोंड जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं, शौर्यगाथाओं, आध्यात्मिक विश्वासों और जीवन-मूल्यों को जनजातीय आख्यानों एवं नृत्य-नाट्यों के माध्यम से प्रस्तुत करने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित गोण्ड सभ्यता के महानायकों आधारित ‘जननायक समारोह’ में शनिवार शाम को ‘राजा लौहगुण्डी’ नृत्य- नाट्य का मंचन किया गया।

इस नृत्य-नाट्य का निर्देशन सतीश श्याम तथा संगीत एच. अनिल सिंह एवं स्वराज श्याम का है। समारोह में मंचित नृत्य -नाट्य प्रस्तुतियों का आलेख योगेश त्रिपाठी-रीवा द्वारा किया गया है। समारोह की शुरूआत नृत्य-नाट्य निर्देशक सतीश श्याम एवं संगीत संयोजक स्वराज श्याम का स्वागत से की गई। कलाकारों का स्वागत वरिष्ठ संगीत निदेशक सीताराम सिंह एवं वरिष्ठ रंग निदेशक नीलेश्वर मिश्रा द्वारा किया।

गोंड जनजातीय आख्यान केवल वीरता और युद्ध की कथाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रकृति के साथ संबंध, समुदाय के प्रति दायित्व, आध्यात्मिक आस्था, पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों की रक्षा तथा संघर्ष के बीच जीवन-मूल्यों को बनाए रखने की प्रेरणा भी दिखाई देती है। ‘जननायक समारोह’ इन्हीं आख्यानों के माध्यम से गोंड समुदाय की सांस्कृतिक निरंतरता और उसके नायकों की लोकस्मृति को मंच पर जीवंत करने का प्रयास है।

राजा लौहगुण्डी कथासार

‘राजा लौहगुण्डी’ नृत्य-नाट्य गोंडवाना के प्रतापी राजा लौहगुण्डी की शौर्यगाथा पर आधारित है। लोक आख्यान के अनुसार राजा लौहगुण्डी ने अपने पराक्रम और बुद्धिमत्ता से गोंडवाना राज्य का विस्तार किया तथा अपनी प्रजा के संरक्षण और कल्याण के लिए कार्य किया। बाल्यावस्था में उनका विवाह राजा पंचनारायण की पुत्री हीरोली कन्या से होता है। इसी बीच दुष्ट राजा रामदरबाई हीरोली कन्या का अपहरण कर उसे बंदी बना लेता है। राजा लौहगुण्डी अपने साहस, बल और बुद्धि का परिचय देते हुए रामदरबाई का सामना करते हैं और हीरोली कन्या को मुक्त कराकर वापस लाते हैं।

इसके बाद वे अपने राज्य का विस्तार करते हुए प्रजा के रक्षक और पराक्रमी शासक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। नृत्य-नाट्य में गोंड संस्कृति और परंपरा से प्रेरित वेशभूषा, लोकनृत्य, संगीत और मंचीय विन्यास का संयोजन किया गया है। लगभग 20 दिनों के पूर्वाभ्यास में तैयार इस प्रस्तुति में 50 से अधिक कलाकार शामिल हैं। 11 दृश्यों में विभाजित इस नृत्य-नाट्य की अवधि लगभग 1 घंटा 20 मिनट है।

मप्र जनजातीय संग्रहालय में आयोजित तीन दिवसीय समारोह के समापन दिवस पर रविवार को ‘राजा हीराखान सिंह छत्री’ का मंचन होगा, जिसका निर्देशन नवीन सिंह तथा संगीत कुलदीप सारवा का है। प्रस्तुतियों का आलेख योगेश त्रिपाठी-रीवा द्वारा किया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर