देहाभिमानी जीव अज्ञानवश भोगता है विविध प्रकार के कष्ट- डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा
झाबुआ, 21 सितम्बर (हि.स.)। शरीर के अभिमान से अभिमानित जीव अज्ञान के अंधकार में डूबकर दैहिक, दैविक और भौतिक तीन प्रकार के कष्ट- भोगता है तथा अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य, पशु पक्षी आदि विभिन्न योनियों में जन्म लेता है और अज्ञानांधकार में भटकते हुए ही यह जीव कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक होता है।
उक्त विचार डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ने मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के थान्दला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अन्तर्गत आयोजित नौ दिवसीय अनुष्ठान श्रीमद्भागवत सप्ताह महोत्सव के दूसरे दिन सोमवार को स्थानीय श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यक्त किए। डॉ. शर्मा श्रीमद्भागवत में वर्णित प्रसंग पुरंजनोपाख्यान का वर्णन करते हुए कथा वाचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि जीव को होने वाले ऐसे महादुख का कारण शरीर को ही सब कुछ मानकर उसमें लिप्त होना है। इस अविद्या के ही कारण जन्म मृत्यु का अनवरत सिलसिला चलता रहता है, जिसकी निवृत्ति का एकमात्र उपाय है, भगवान् श्री हरि विष्णु की भक्ति।
शर्मा ने पुरंजनोपाख्यान प्रसंग में श्रीमद्भागवत महापुराण का उद्धरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि मनुष्य शरीर एक रथ के समान है, जिसमें ज्ञानेन्द्रिय रुपी पांच घोड़े जुते हुए हैं। साल दर साल के रूप में बीत रहा कालखंड ही उस रथ का वेग है, पुण्य और पाप कर्म, उस रथ के दो पहिये हैं। सत्व, रज, तम रुप तीन गुण उसकी ध्वजा हैं, पांच प्राण डोरियां हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है, और जीव का हृदय ईश्वर के बैठने का स्थान है। इन्द्रियों के पांच विषय उस रथ में रखे हुए आयुध हैं, रस, रक्त, मांस, भेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र आवरण हैं, तथा पांच कर्मेंद्रियां शरीर की पांच प्रकार की गति है, और इस शरीर रुपी रथ पर रथी के समान आसीन यह जीव मृगतृष्णा के समान मिथ्या विषयों की और दौड़ता रहता है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि कुत्सित वासनाओं के वशीभूत होकर हमारा शरीर रुपी यह रथ क्षतिग्रस्त होकर नष्ट भ्रष्ट हो जाता है, किंतु यदि हम इसे खराब रास्तो पर जाने से रोक सकें तो सुपथ पर दौड़ता हुआ यही रथ हमें अपनी चिर प्रतीक्षित मंजिल कर्थात आत्मानुसंधान के महानतम उद्देश्य की और ले जा सकता है।
शर्मा ने कहा कि शरीर भाव में भावित रहने वाली यह अंधी दौड़ तभी रुक सकती है,जब हम शरीर भाव से ऊपर उठकर परमात्मभाव में स्थित हो जाएं, और इस भाव की प्राप्ति का उपाय भगवान् श्रीकृष्ण की लीला कथाओं का श्रवण, कीर्तन और उनके पावन नामों के स्मरण से ही संभव है। भगवान् के श्री चरणों का आश्रय लेकर द्रृढ़ता पूर्वक उन प्रभु की भक्ति के बगैर इस कलिकाल में कोई अन्य प्रभावी उपाय नहीं नजर आता है, जो कि इस अंधी दौड़ को रोक सके।
आज दूसरे दिन की कथा में पुरंजनोपाख्यान प्रसंग का वाचन करते हुए शर्मा ने कहा कि राजा पुरंजन की पुरंजनी नामक स्त्री में गहरी आसक्ति ने उसे स्त्रीमय बना दिया, परिणामस्वरूप न केवल इस जन्म में वह भोग वासनाओं का दास बना रहा और पुरंजनी स्त्री के हाथों में खेलता रहा, बल्कि दूसरे जन्म में भी उसे स्त्री के रूप में जन्म लेना पड़ा। एक मित्र अविज्ञात के रूप में ईश्वर सदा उसके साथ रहा, और उसे सावधान करने का प्रयास करता रहा, किन्तु कामान्ध पुरंजन कुछ समझ न सका, और मृत्यु का काल आ पहुंचा। जीवन के अंतिम समय में भी उसने स्त्री का चिंतन करते हुए ही देह का त्याग किया था, अतः अंत: गति सो मति, उसे स्त्री के रूप में जन्म लेना पड़ा।
उन्होंने कहा कि यह कथा केवल एक पुरंजन की ही नहीं, वल्कि हम सबकी कथा है। इसलिए यह निश्चित है कि हमारी आसक्ति चाहे सांसारिक भोग वासनाओं में हो, चाहे ईश्वर में हो, वह अवश्य ही संस्कार का रूप ग्रहण करेंगी, और वर्तमान जीवन ही नहीं, बल्कि आगामी जीवन की भी दिशा निर्धारित करेगी, इसीलिए हमारे धर्म शास्त्रों में बार बार रेखांकित किया गया है कि हम अपना मन भगवान् में लगाएं। वेद, उपनिषद और पुराणों में इन्द्रियों से की जाने वाली भक्ति के बदलें मन से की गई भक्ति को अधिक श्रैष्ठ माना गया है। ईश्वर निमित्त सब कर्मों में हम अपने मन को संयुक्त कर दें, तो साधना परिपूर्णता की ओर बढ़ेगी।
शर्मा ने उक्त प्रसंग के संदर्भ में मनुष्य मन की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि जीव का अपना मन ही उसके लिए बन्धन और मोक्ष दोनों का कारण है, यह मन यदि वासनाओं के वशीभूत होकर संसार में लगे तो बंधन का कारण बन जाता है, और यदि ईश्वर की और उन्मुख हो जाए तो मोक्ष का कारण बन जाता है। मन ही बुद्धि को भ्रमित करता है, और यही मन परमात्मतत्व की प्राप्ति में भी हमारा सहायक बन जाता है। इसलिए यह हम पर ही निर्भर है कि हम अपने मन को भोग विलास की तरफ जाने की छूट देते हैं, या फिर ईश्वर की सेवा में लगाते हैं। यह चुनाव हमारा है, जिसे समय रहते हमें करना ही होगा।
कथा में भगवान् कपिल देव द्वारा अपनी माता देवहूति को दिए गए उपदेश प्रसंग का वाचन करते हुए डॉ शर्मा ने कहा कि महायोगी भगवान् श्री कपिलदेव ने आत्म ज्ञान का उपदेश करते हुए भक्ति योग की महिमा का वर्णन किया। भगवान् श्री कपिलदेव अपनी माता को भक्ति तत्व का उपदेश करते हुए कहते हैं कि जो मुझमें अनन्य भाव से सुद्रढ़ प्रेम करते हुए मेरे लिए संपूर्ण कर्म तथा अपने सगे संबंधियों को भी त्याग देते हैं, और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, कीर्तन करते हैं, तथा मुझमें ही चित्त लगाए रहते हैं, उन भक्तों को संसार के विभिन्न ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचाते हैं।
आज कथा में दक्ष यज्ञ, ध्रुव की भक्ति, भगवान् रुद्र द्वारा प्रचेताओ को दिए गए स्तोत्रात्मक उपदेश सहित महाराज पृथु के आख्यानों का भी वाचन किया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर