देवासः पंडित कुमार गंधर्व समारोह का समापन, रागों की रश्मियों में नहाई सुरमयी संध्या
- अनहद नाद से वातावरण हुआ आलोकित
देवास, 07 जून (हि.स.)। मध्य प्रदेश के देवास स्थित मल्हार स्मृति मंदिर में आयोजित दो दिवसीय “पं. कुमार गंधर्व समारोह” का रविवार शाम को द्वितीय एवं अंतिम दिवस अत्यंत गरिमामय वातावरण में समापन हुआ। यह संध्या शास्त्रीय संगीत की विविध विधाओं, राग-भाव और समकालीन प्रस्तुति-शैली के अद्भुत संगम के रूप में स्मरणीय बन गई।
इस अवसर पर कलाकारों का स्वागत उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर एवं उप निदेशक शेखर करहाड़कर ने किया। कार्यक्रम की प्रथम प्रस्तुति में इंदौर की सुप्रसिद्ध गायिका पूर्वी निमगांवकर ने राग रागेश्री से अपने गायन की मनमोहक शुरुआत की। उन्होंने विलंबित तीनताल में निबद्ध बंदिश “आली पलक ना लागी” के माध्यम से राग की गंभीरता और भाव-गहराई को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात द्रुत आड़ाचौताल में “जाने ना दूँगी रसिया” की सशक्त प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। समापन में मिश्र गारा में झूला गीत “बदरिया बरसे रे झूला धीरे झूल रे” ने वातावरण को रसपूर्ण एवं भावप्रधान बना दिया। इस प्रस्तुति में तबले पर पं. हितेंद्र दीक्षित तथा हारमोनियम पर विवेक जैन ने सशक्त संगति प्रदान की।
द्वितीय प्रस्तुति में दिल्ली के सुप्रसिद्ध गायक डॉ. अविनाश कुमार ने राग मारु बिहाग से अपने गायन की शुरुआत की। उन्होंने विलंबित एकताल में बंदिश “पिया नाहीं घर” को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत कर राग की शास्त्रीय गहराई को उजागर किया। इसके पश्चात द्रुत तीनताल में “मन ले गया साँवरा” तथा द्रुत एकताल में उनकी स्वरचित बंदिश “सावन घनघोर घोर” ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। आगे राग देश में प्रस्तुत ठुमरी ने संध्या को मधुरता प्रदान की तथा अंत में एक मराठी अभंग के माध्यम से उनकी प्रस्तुति का सुंदर समापन हुआ। इस प्रस्तुति में तबले पर निशांत शर्मा एवं हारमोनियम पर विवेक जैन ने संगति की।
तृतीय एवं अंतिम प्रस्तुति में वायलिन एवं बांसुरी की मनोहारी जुगलबंदी प्रस्तुत हुई, जिसमें पं. अतुल उपाध्ये एवं पं. विवेक सोनार ने राग किरवानी में आलाप, जोड़ और झाला के माध्यम से शास्त्रीय सौंदर्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इसके पश्चात राग भोपाली में नौ मात्रा की बंदिश तथा लयकारी के विविध रूपों ने संगीत की तकनीकी और भावात्मक दोनों ही पक्षों को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया। समापन में पं. कुमार गंधर्व के भजनों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने संपूर्ण सभागार को आध्यात्मिक रस से भर दिया।
समग्र रूप से यह संध्या शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा, नवाचार और पं. कुमार गंधर्व की संगीत-दृष्टि को समर्पित एक अविस्मरणीय सांस्कृतिक आयोजन सिद्ध हुई, जिसने देवास की संगीत-परंपरा को एक बार फिर गरिमा एवं वैश्विक पहचान प्रदान की।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर