पॉक्सो पीड़ित कोई बच्चा अब नहीं रहेगा अकेला, राज्य बाल आयोग की एसओपी लागू, पुलिस मुख्यालय ने पूरे प्रदेश में जारी किए सख्त निर्देश
-बाल आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा की पहल पर बनी एसओपी को जमीनी अमल शुरू
- 24 घंटे में सीडब्ल्यूसी को सूचना देना पुलिस के लिए हो गया अनिवार्य
- मामलों में 'सपोर्ट पर्सन' की नियुक्ति होगी अनिवार्य
भोपाल, 28 जुलाई (हि.स.)। यौन अपराध का शिकार बनने वाले किसी बच्चे के लिए सबसे कठिन संघर्ष न्याय की पूरी प्रक्रिया के दौरान भय, असुरक्षा, मानसिक आघात और सामाजिक दबाव से जूझने का होता है। इसी संवेदनशील चुनौती को केंद्र में रखते हुए मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने एक ऐसी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की है, जो पॉक्सो पीड़ित बच्चों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए न्यायिक प्रक्रिया के हर चरण में मानवीय सहारा उपलब्ध कराने का मार्ग प्रशस्त करती है।
दरअसल, आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा के हस्ताक्षरों से जारी इस एसओपी को अब पूरे प्रदेश में प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय ने सभी पुलिस आयुक्तों, जिला पुलिस अधीक्षकों और विशेष किशोर पुलिस इकाइयों को विस्तृत निर्देश जारी कर दिए हैं। अब प्रत्येक पॉक्सो प्रकरण में 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) को सूचना भेजना और प्रत्येक पात्र मामले में 'सपोर्ट पर्सन' की नियुक्ति सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा।
बाल आयोग ने बदली पॉक्सो मामलों की सोच
उल्लेखनीय है कि अब तक अधिकांश पॉक्सो मामलों में जांच और अभियोजन ही व्यवस्था का केंद्र हुआ करते थे, जबकि पीड़ित बच्चा और उसका परिवार पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अक्सर अकेले पड़ जाते थे। मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की नई एसओपी इस सोच को बदलती है। इसमें पहली बार पूरे तंत्र का केंद्र अपराध के साथ ही पीड़ित बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) बनाया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि न्याय तभी सार्थक माना जाएगा, जब बच्चा पूरी प्रक्रिया के दौरान मानसिक, सामाजिक और विधिक रूप से सुरक्षित महसूस करे।
'सपोर्ट पर्सन' है बच्चे का अधिकार
आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा द्वारा जारी एसओपी में स्पष्ट किया गया है कि पॉक्सो अधिनियम, 2012 तथा पॉक्सो नियम, 2020 के तहत 'सपोर्ट पर्सन' की नियुक्ति किसी प्रकार की वैकल्पिक व्यवस्था न मानी जाए, यह कानूनी दायित्व है। एसओपी में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्रत्येक पात्र मामले में बाल कल्याण समिति को सपोर्ट पर्सन नियुक्त करना होगा और यदि किसी मामले में नियुक्ति नहीं की जाती है तो उसके ठोस कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाने चाहिए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियुक्ति किसी पीड़ित अथवा उसके अभिभावक की इच्छा पर निर्भर न होकर कानून के अनुरूप संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा होगी।
अब पुलिस की जिम्मेदारी भी होगी तय
बाल आयोग की एसओपी को प्रभावी बनाने के लिए पुलिस मुख्यालय ने 22 जुलाई 2026 को महिला सुरक्षा शाखा के माध्यम से राज्य के सभी पुलिस आयुक्तों और जिला पुलिस अधीक्षकों को आदेश जारी किया है। आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि प्रत्येक पॉक्सो प्रकरण में संबंधित थाना अथवा विशेष किशोर पुलिस इकाई (एसजपीयू) एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति को सूचना भेजे। पुलिस मुख्यालय ने यह भी निर्देश दिया है कि आयोग की एसओपी में पुलिस से संबंधित सभी दायित्वों का समयबद्ध पालन सुनिश्चित किया जाए।
24 घंटे की समय-सीमा बनेगी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
नई व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी समयबद्धता है। जैसे ही पॉक्सो प्रकरण दर्ज होगा, पुलिस को पीड़ित बच्चे, उसके परिवार और घटना से संबंधित आवश्यक विवरण बाल कल्याण समिति तक पहुंचाने होंगे। इसके बाद समिति मामले की समीक्षा कर तत्काल सपोर्ट पर्सन नियुक्त करेगी। एसओपी में पूरी प्रक्रिया का चरणबद्ध प्रारूप तैयार किया गया है, ताकि किसी स्तर पर देरी या भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।
कौन होगा 'सपोर्ट पर्सन' और क्या होगी उसकी भूमिका
एसओपी के अनुसार सपोर्ट पर्सन पूरे न्यायिक सफर में बच्चे और उसके परिवार का मार्गदर्शक बनेगा। उसकी जिम्मेदारी पीड़ित और उसके परिवार से नियमित संपर्क बनाए रखना, मनोसामाजिक परामर्श उपलब्ध कराना, कानूनी सहायता से जोड़ना, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तथा जिला बाल संरक्षण इकाई से समन्वय स्थापित करना, पुनर्वास की प्रक्रिया में सहयोग देना तथा बच्चे की सुरक्षा और गरिमा बनाए रखना होगी। इससे बच्चा न्यायिक प्रक्रिया में स्वयं को अकेला महसूस नहीं करेगा।
केस डायरी से लेकर एसपी कार्यालय तक होगी निगरानी
एसओपी में दिशा-निर्देशों के अलावा एक विस्तृत चेकलिस्ट भी तैयार की गई है, जिसके अनुसार पुलिस अधिकारियों को केस डायरी में यह दर्ज करना होगा कि बाल कल्याण समिति को सूचना कब भेजी गई, सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति कब हुई और उससे संबंधित कार्रवाई क्या रही। वहीं एसपी कार्यालय स्तर पर भी इन मामलों की नियमित समीक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था बनाई गई है। इससे पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी।
पुलिस, बाल आयोग और सीडब्ल्यूसी के बीच बनेगा समन्वित तंत्र
इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब पुलिस, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और सपोर्ट पर्सन अलग-अलग इकाइयों के बीच एक समन्वित बाल संरक्षण तंत्र के रूप में कार्य करेंगे, ताकि जांच प्रक्रिया अधिक संवेदनशील बने और पीड़ित बच्चे को न्याय मिलने की संभावना भी मजबूत हो सके।
बाल अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण संस्थागत पहल
उल्लेखनीय है कि बाल अधिकारों के क्षेत्र में कार्य करने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि पॉक्सो मामलों में अपराध की विवेचना पर्याप्त नहीं है, बच्चे के मानसिक और सामाजिक पुनर्वास को भी समान महत्व मिलना चाहिए। मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की यह एसओपी उसी सोच को प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बनाती है। पुलिस मुख्यालय द्वारा इसे पूरे प्रदेश में लागू करने के निर्देश यह संकेत देते हैं कि राज्य अब बाल संरक्षण को कानूनी दायित्व से अधिक संवेदनशील शासन का महत्वपूर्ण आधार मान रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी