भोपालः भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पुस्तकों के लेखन के लिए दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ
भोपाल, 24 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा विभाग एवं राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पुस्तकों के लेखन के लिए, सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, भोपाल में शनिवार को दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य उच्च शिक्षा के लिए गुणवत्तापूर्ण, मौलिक एवं प्रामाणिक पाठ्यसामग्री तैयार करने के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रमों में व्यवस्थित रूप से शामिल करना है।
कार्यशाला में उच्च शिक्षा आयुक्त प्रबल सिपाहा, मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक डॉ. अशोक कड़ेल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी, शिक्षाविद् डॉ. चांद किरण सलूजा तथा वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, हरियाणा के पूर्व कुलपति डॉ. रमेश चंद्र भारद्वाज सहित विषय विशेषज्ञों ने सहभागिता की।
प्रामाणिक शोध सामग्री के आधार पर तैयार होंगी पुस्तकें
उच्च शिक्षा आयुक्त प्रबल सिपाहा ने कहा कि शोध विषयक सामग्री को प्रमाणित करने के बाद ही उसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। कार्यशाला में भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल आधारों और प्रामाणिक स्रोतों की समीक्षा के साथ विभिन्न संकायों एवं विषयों के अनुरूप पुस्तक लेखन की रूपरेखा पर चर्चा की गई।
उच्च शिक्षा विभाग के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी दिनेश दवे ने बताया कि कार्यशाला के आगामी सत्रों में संकायवार एवं विषयवार भारतीय ज्ञान परंपरा पर विमर्श होगा। विषय विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में प्रामाणिक सामग्री के चयन, विषयों की योजना, भाषा-शैली, प्रश्नों, गतिविधियों एवं अभ्यासों के स्वरूप पर चर्चा की जाएगी। अंतिम सत्र में संकायवार समूह चर्चा के माध्यम से पुस्तक लेखन की दिशा को आगे बढ़ाया जाएगा।
विद्यार्थियों के समग्र विकास पर केंद्रित हो पुस्तक लेखन
मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक डॉ. अशोक कड़ेल ने कहा कि विद्यार्थियों को सत्र के प्रारंभ में ही आवश्यक पुस्तकें उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तृतीय वर्ष की पाठ्यपुस्तकों के लेखन पर कार्य किया जाएगा। पुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रामाणिक तथ्यों को समाहित करते हुए विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
विषय विशेषज्ञ डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल तत्वों को समझकर पाठ्यपुस्तकों में शामिल करना आवश्यक है। उन्होंने शिक्षा में भारतीयता, मानवीय दृष्टिकोण, आध्यात्मिक विकास और बहुविषयक दृष्टि को महत्व देने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पुस्तकों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष के पाठ्यक्रमों के बीच क्रमबद्धता होनी चाहिए तथा प्रत्येक पाठ के बाद गतिविधियों को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।
डॉ. रमेश चंद्र भारद्वाज ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के आधारभूत तत्वों एवं प्रामाणिक स्रोतों की समीक्षा की। वहीं, विषय विशेषज्ञ डॉ. मीनाक्षी ने भारतीय गणित की विभिन्न शाखाओं और उसके ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रमाणों पर प्रकाश डाला।
कार्यशाला के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित प्रामाणिक, सुव्यवस्थित एवं गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों के लेखन को दिशा प्रदान की जा रही है। इससे विद्यार्थियों को भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने तथा अकादमिक जगत में मौलिक साहित्य के सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर