‘कृषक कल्याण वर्ष’ पर जीतू पटवारी ने उठाए सवाल, किसान की आय और एमएसपी पर मांगा जवाब

 


भोपाल, 12 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने ‘कृषक कल्याण वर्ष’ को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से किसान की आय, खेती की लागत, फसल के दाम, कर्ज, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और फसल बीमा से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को आयोजनों और घोषणाओं से आगे बढ़कर यह बताना चाहिए कि प्रदेश के किसान की आर्थिक स्थिति में वास्तव में कितना सुधार हुआ है।

जीतू पटवारी ने बुधवार काे बयान जारी कर कहा कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के 2018-19 के सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश के 48.4 प्रतिशत कृषि परिवार कर्जदार थे। केंद्र सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक उस समय प्रति कृषि परिवार औसत बकाया ऋण 74,420 रुपये था। उन्होंने कहा कि किसान की आय के मामले में भी सरकारी दावों और उपलब्ध आंकड़ों के बीच अंतर दिखाई देता है। एनएसओ के परिस्थिति मूल्यांकन सर्वेक्षण के अनुसार 2018-19 में मध्यप्रदेश के कृषि परिवार की औसत मासिक आय 8,339 रुपये थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 10,218 रुपये थी।

पटवारी ने कहा कि ‘कृषक कल्याण वर्ष’ में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि किसान परिवार की वर्तमान औसत आय कितनी है और पिछले वर्षों की तुलना में उसमें कितनी वृद्धि हुई है। यदि सरकार के पास नए आंकड़े उपलब्ध हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि किसान कल्याण से जुड़े दावों का वास्तविक आकलन हो सके।

एमएसपी के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि एमएसपी किसान के लिए केवल घोषणा नहीं, बल्कि उसकी उपज के लिए प्रभावी मूल्य सुरक्षा का माध्यम होना चाहिए। उन्होंने मांग की कि सरकार यह स्पष्ट करे कि प्रदेश में कितनी कृषि उपज एमएसपी पर खरीदी गई और कितने किसानों को घोषित समर्थन मूल्य का वास्तविक लाभ मिला। उन्होंने कहा कि मंडियों में गुणवत्ता, नमी और अन्य मानकों के कारण किसानों को कई बार अपनी उपज के अपेक्षित मूल्य से कम दाम मिलने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे में केवल एमएसपी घोषित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी प्रभावी खरीद व्यवस्था सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

बढ़ती लागत और सिंचाई की चुनौती

पीसीसी चीफ पटवारी ने कहा कि बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मजदूरी और सिंचाई जैसी लागत बढ़ने से किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। यदि उत्पादन बढ़ता भी है, लेकिन किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिलता, तो इसका सीधा लाभ उसकी आय में दिखाई नहीं देता। उन्होंने सरकार से फसलवार लागत और किसान को मिलने वाले वास्तविक मूल्य का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। सिंचाई और बिजली के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि मौसम की अनिश्चितता, अतिवृष्टि, सूखा और बिजली से जुड़ी समस्याओं का सीधा असर कृषि उत्पादन और किसान की आय पर पड़ता है। सरकार को यह बताना चाहिए कि इन जोखिमों से किसानों को स्थायी सुरक्षा देने के लिए क्या प्रभावी व्यवस्थाएं की गई हैं।

फसल बीमा में पारदर्शिता पर जोर

जीतू पटवारी ने फसल बीमा योजना को लेकर भी सरकार से पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने कहा कि किसान को नुकसान होने पर समय पर और वास्तविक क्षति के अनुरूप भुगतान मिलना जरूरी है। सरकार को जिला और फसलवार यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि कितने किसानों ने दावे किए, कितने दावों का भुगतान हुआ, कितने मामले लंबित हैं और किसानों को वास्तविक नुकसान की तुलना में कितना मुआवजा मिला।

कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं पर भी उठाए सवाल

उन्होंने कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र से जुड़े 835 लोगों ने आत्महत्या की। उन्होंने कहा कि ऐसे आंकड़ों को केवल संख्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इनके पीछे कर्ज, फसल का उचित मूल्य, प्राकृतिक आपदा, बढ़ती लागत और आर्थिक असुरक्षा जैसे संभावित कारणों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए।

मुख्यमंत्री से मांगा आंकड़ों का जवाब

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सवाल करते हुए कहा कि यदि किसान की आय बढ़ी है तो उसका ताजा आंकड़ा सार्वजनिक किया जाए। यदि खेती की लागत कम हुई है तो फसलवार लागत और किसान की आय का विवरण बताया जाए। यदि एमएसपी का लाभ किसानों को मिल रहा है तो एमएसपी पर हुई वास्तविक खरीद के आंकड़े सामने रखे जाएं। साथ ही, किसान कर्ज और कृषि क्षेत्र में आत्महत्या जैसे मुद्दों पर भी सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसान को केवल सरकारी आयोजनों में सम्मान नहीं, बल्कि उसकी मेहनत की फसल का उचित मूल्य चाहिए। सरकार को किसानों से जुड़े दावों और योजनाओं का जिला, फसल और वर्षवार डेटा सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि ‘कृषक कल्याण वर्ष’ के परिणामों का वस्तुनिष्ठ आकलन किया जा सके।

पटवारी ने कहा कि “मंच नहीं, मुनाफा चाहिए घोषणा नहीं, गारंटी चाहिए भाषण नहीं, बाजार चाहिए।” उन्होंने कहा कि ‘कृषक कल्याण वर्ष’ की सार्थकता इसी से तय होगी कि किसान की आय में वास्तविक वृद्धि कितनी हुई, कृषि लागत पर कितना नियंत्रण हुआ, एमएसपी का लाभ कितने किसानों तक पहुंचा और फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को कितनी राहत मिली।

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे