अनूपपुर: मां नर्मदा करती हैं श्रावण माह के एक सोमवार को पातालेश्वर महादेव का अभिषेक
अनूपपुर, 09 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में आस्था का केंद्र अमरकंटक मैकल की पहाड़ियों में भी हैं, जहां के संबंध में माना जाता है कि यहां नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के साथ भगवान शिव की भी तपस्या स्थली भी है। जहां प्राकृतिक छटा, ऋषियों - की तपोभूमि और नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के रूप में विख्यात अमरकंटक में स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर का - पौराणिक इतिहास अत्यंत समृद्ध और श्रद्धा से परिपूर्ण है।
यह मंदिर न केवल वास्तुकला की दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का केन्द्र भी है। सावन का माह हिन्दुओं में सदा ही भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। मां नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री कहा जाता है। यहां पुरातत्व महत्व के स्थापत्य कला भी नगर की विशेषताओं में चार चांद लगाते हैं। अमरकंटक में कई प्राचीन शिव मंदिरों के बीच नर्मदा मंदिर से दक्षिण की ओर 100 मीटर की दूरी पर कलचुरीकालीन पातालेश्वर महादेव, शिव, विष्णु, जोहिला कर्ण मंदिर और पंच मठ मंदिरों का समूह है। इन मंदिरों का निर्माण 10-11 वीं शताब्दी में कलचुरी महाराजा नरेश कर्ण देव ने 1041-1073 ईस्वी में बनवाया था।
पातालेश्वर महादेव मंदिर की विशेषताएं
भूमि इस प्राचीन शिवलिंग की स्थापना जगतगुरु आद्य शंकराचार्य द्वारा की गई थी। मंदिर का नाम पातालेश्वर इसलिए पड़ा क्योंकि शिवलिंग से लगभग दस फीट नीचे स्थित है, जो भक्तों के बीच अत्यंत श्रद्धा का विषय है। एक अद्भुत तथ्य यह भी है कि श्रावण मास के किसी एक सोमवार को नर्मदा जल स्वयं होकर इस गहराई तक पहुंचता है, जिसे चमत्कार और आशीर्वाद स्वरूप माना जाता है।
नर्मदा मंदिर पुजारी धनेश द्विवेदी बताते हैं कि पातालेश्वर महादेव मंदिर अपने नाम के अनुसार ही यहां स्थित है। यानी, मंदिर का शिवलिंग पृथ्वी की सतह से लगभग 10 फीट की गहराई में स्थापित है। मान्यता है कि पातालेश्वर शिवलिंग की जलहरी में हर साल श्रावण माह के किसी एक सोमवार को मां नर्मदा यहां भगवान शिव का अभिषेक करने पहुंचती हैं। इस दौरान शिवलिंग के ऊपर तक जल भर जाता है। यह सिर्फ सावन में होता है। अमरकंटक वह भूमि है जहाँ मेघालय की मेकल श्रृंखला के समीप अनेक महान ऋषियों कपिल, भृगु, व्यास आदि ने तपस्या की थी। जगदुरु शंकराचार्य ने यहीं पर नर्मदाष्टक की रचना की और अनेक शिव मंदिरों की स्थापना की, जिससे यह स्थान धर्म और दर्शन का संगम बन गया।
अमरकंटक के अन्य आध्यात्मिक आकर्षण
नर्मदा उद्गम स्थलः भारत की पुण्य सलिला नर्मदा नदी का उद्गम यहीं से होता है। कपिलधारा जलप्रपातः यहाँ से नर्मदा 100 फीट ऊँचाई से गिरती है, और यह स्थान ऋषि कपिल की तपस्थली है। दुग्धधारा जलप्रपातः इस जलप्रपात में गिरता जल दूध के समान उज्ज्वल प्रतीत होता है, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
माता पार्वती के साथ यहीं रुके थे शिव
पुराणों में उल्लेख है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ यहीं रुके थे। नर्मदा मंदिर, सोनमूडा, माई की बगिया सहित जालेश्वर धाम के साथ नर्मदा मंदिर से सटे पातालेश्वर शिवलिंग मंदिर से भी बड़ी आस्था जुड़ी है। कहते हैं, इस मंदिर की स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। पातालेश्वर महादेव का मंदिर विशिष्ट प्रकार से पंचरथ शैली में बना है। 16 स्तंभों में आधार वाले मंडप सहित यह मंदिर निर्मित है। मान्यता है कि इस शिव मंदिर में शिव साधना फलदायी होती है। वर्तमान में यह स्थल पुरातत्व विभाग के अधीन है, तब से पातालेश्वर महादेव सहित अन्यम मंदिरों में पूजा अर्चना बंद हैं।
शोण शक्तिपीठ
यहाँ माता सती का दक्षिण नितम्ब गिरा था, जिसके कारण यह एक शक्तिपीठ है। श्रावण मास में विशेष महत्वःश्रावण मास में पातालेश्वर महादेव की पूजा, रुद्राभिषेक एवं विशेष जल अर्पण का अत्यधिक महत्व है। इस मास में यहां आने वाले श्रद्धालु विशेष फल प्राप्त करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।अमरकंटक स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा दिव्य स्थल है, जो पौराणिक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक तीनों ही रूपों में अद्वितीय है। श्रावण मास के इस पवित्र अवसर पर अधिक से अधिक श्रद्धालु इस मंदिर में आकर भगवान शिव के दर्शन करें और उनकी कृपा से जीवन में शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त करें।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला