मथुरा की तर्ज पर पन्ना में मनाया गया श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, जुगल किशोर मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब
पन्ना, 05 सितंबर (हि.स.)। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व मध्य प्रदेश के पन्ना में श्रद्धा, उल्लास और धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए जुगल किशोर मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। मंदिर में कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं। जन्मोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण और राधा की जुगल जोड़ी के दर्शन के लिए पहुंचे।
पन्ना में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाने की परंपरा मथुरा की तर्ज पर रही है। नगर के मध्य स्थित ऐतिहासिक जुगल किशोर मंदिर यहां की धार्मिक पहचान का प्रमुख केन्द्र है। मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रतिमाओं के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मान्यता है कि जुगल किशोर सरकार के दरबार में श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
1813 में पन्ना नरेश हिन्दूपत ने कराया था मंदिर का निर्माण
जुगल किशोर मंदिर का निर्माण वर्ष 1813 में तत्कालीन पन्ना नरेश हिन्दूपत ने कराया था। मंदिर में विराजमान राधा-कृष्ण की मनोहारी जुगल जोड़ी के दर्शन के लिए प्रतिदिन दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार यह जुगल जोड़ी ओरछा से पन्ना पहुंची थी। तभी से भगवान श्रीकृष्ण और राधा की आकर्षक छवि श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती आ रही है। पन्ना के धार्मिक जीवन में इस मंदिर को विशेष स्थान प्राप्त है।
ओरछा से पन्ना पहुंचे जुगल किशोर सरकार की रोचक कथा
राधा-कृष्ण के जुगल किशोर स्वरूप के ओरछा से पन्ना पहुंचने की कथा भी बुंदेलखंड की धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है। जनश्रुतियों के अनुसार ओरछा के राजा मधुकर शाह भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। उन्हें श्रीकृष्ण भक्ति की प्रेरणा अपने गुरु पंडित हरिराम व्यास से मिली थी। धार्मिक मान्यता है कि पंडित हरिराम व्यास की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान जुगल किशोर वृंदावन से ओरछा आए थे।
ओरछा पहुंचने के बाद भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में राजा और प्रजा दोनों गहराई से डूब गए। पंडित हरिराम व्यास के मार्गदर्शन में राजदरबार में रासलीला का आयोजन होने लगा। भक्त सखी भाव में श्रृंगार कर भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते थे।
राजा मधुकर शाह की कृष्ण भक्ति से उनकी पत्नी महारानी कुंवर गनेशी सहमत नहीं थीं। वह भगवान श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। दोनों के आराध्य और भक्ति पद्धति को लेकर मतभेद हुआ। महारानी ने संकल्प लिया कि वह अपने आराध्य रामराजा को लेकर ही ओरछा लौटेंगी। इसी क्रम में उन्होंने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के तट पर कठोर तपस्या की।
जनश्रुति के अनुसार जब उन्हें भगवान श्रीराम के दर्शन नहीं हुए तो उन्होंने सरयू में जल समाधि लेने का निर्णय किया। इसी दौरान भगवान श्रीराम उनकी गोद में प्रकट हुए। भगवान ने ओरछा चलने की सहमति दी, लेकिन शर्त रखी कि वह केवल पुष्य नक्षत्र में ही यात्रा करेंगे। महारानी अपने संकल्प पर अडिग रहीं और कठिन यात्रा पूरी कर भगवान रामराजा को ओरछा ले आईं।
बाद में राज्य की राजधानी टीकमगढ़ स्थानांतरित कर दी गई। इसी कालखंड में जुगल किशोर सरकार को गोविंद दीक्षित की प्रेरणा से पन्ना लाया गया। पन्ना पहुंचने पर भगवान को कुछ समय के लिए विंध्यवासिनी मंदिर में रखा गया। इसके बाद उन्हें जिस स्थान पर स्थायी रूप से विराजमान किया गया, वही आज जुगल किशोर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर का भवन बुंदेली स्थापत्य की छाप लिए उत्तर मध्यकालीन वास्तुशिल्प की विशेषताओं को समेटे हुए है।
पूरे बुंदेलखंड की आस्था का केन्द्र है जुगल किशोर मंदिर
जुगल किशोर मंदिर केवल पन्ना ही नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र है। प्रत्येक अमावस्या पर बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भक्त यहां भगवान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पन्ना की पहचान भी जुगल किशोर सरकार से जुड़ी हुई है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार पन्ना के हीरा कारोबार और उसकी चमक को भी भगवान जुगल किशोर की कृपा से जोड़ा जाता है। मंदिर में सामान्य दिनों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। धार्मिक विश्वास है कि अमावस्या के दिन जुगल किशोर सरकार के समक्ष मांगी गई मनोकामना पूरी होती है। यह भी मान्यता है कि चारों धाम या अन्य तीर्थों की यात्रा के बाद पन्ना पहुंचकर जुगल किशोर मंदिर में दर्शन करना आवश्यक है। इसी विश्वास के चलते अनेक तीर्थयात्री अपनी यात्रा पूरी करने के बाद यहां पहुंचकर भगवान के समक्ष शीश नवाते हैं।
प्रणामी सम्प्रदाय में 11 तोपों की सलामी के बाद होता है श्रीकृष्ण जन्म
पन्ना के महामति प्राणनाथ धाम में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की परंपरा अपने आप में अनूठी है। यहां मुरली मनोहर के जन्म के अवसर पर 11 तोपों की सलामी दी जाती है। मध्यरात्रि में जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होता है, पहले एक और फिर क्रमशः कुल 11 तोपों की सलामी दी जाती है। इसके बाद मंदिर परिसर में बधाई गीतों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो देर रात तक चलता है।
जन्म से पहले गोपिका भाव के साथ जोगमाया के गीत भी गाए जाते हैं। प्रणामी सम्प्रदाय के हजारों श्रद्धालु जन्माष्टमी के इस आयोजन में उत्साह और आस्था के साथ शामिल होते हैं।
जन्माष्टमी के बाद नंदोत्सव और दधिकांदव की विशेष परंपरा
प्रणामी सम्प्रदाय में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के बाद आयोजित होने वाला नंदोत्सव भी विशेष आकर्षण का केन्द्र रहता है। इसके साथ दधिकांदव की परंपरा का भी विशेष महत्व है। इस आयोजन में दही, ककड़ी, मिठाई, फल-फूल और मेवों के साथ श्रद्धालुओं के बीच उत्साहपूर्ण झूमाझटकी होती है। गरबा नृत्य भी दधिकांदव समारोह का खास हिस्सा माना जाता है।
प्रणामी परंपरा में श्रीकृष्ण के जन्म के तीन स्वरूपों की भी धार्मिक व्याख्या की जाती है। मान्यता के अनुसार कारागार में देवकी की कोख से जन्म लेने पर वह विष्णु स्वरूप बैकुंठवासी कृष्ण हैं। ब्रज की ओर जाते समय उनका स्वरूप गोकुलवासी कृष्ण का माना जाता है, जबकि बाल लीलाओं और दुष्टों के संहार के दौरान उन्हें पूर्ण ब्रह्म स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
इस प्रकार पन्ना में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की ऐतिहासिक परंपराओं, लोक आस्था और कृष्ण भक्ति का जीवंत उत्सव बन जाता है। जुगल किशोर मंदिर से लेकर प्रणामी सम्प्रदाय की अनूठी परंपराओं तक, जन्माष्टमी पर पूरा पन्ना कृष्ण भक्ति के रंग में रंगा नजर आता है।
हिन्दुस्थान समाचार / सुरेश पांडे