मुरैना: करील और पीलू गरीबों की आजीविका के स्त्रोत
मुरैना, 25 मार्च (हि.स.)। करील की टैटी का अचार पेट विकारों के लिए रामबाण का काम करता है। कैसी भी भीषण सर्दियों में करील की टैटी का अचार खाने के बाद गर्मी महसूस होने लगती है। यह तासीर है करील की टैटी के अचार की चम्बल में इस समय करील में फूल आ रहा है इन टैटियों के पकने का समय जून जुलाई में इनके पकने का समय है ।
कटीली झाड़ियों में जहाँ तहाँ इनके गुच्छे लटकते दिखते हैं इन झाड़ियों को यहाँ करेल या करील कहा जाता है। इनमें पत्ते बहुत कम होते हैं और इनके हरे तनों पर कांटे उगे होते हैं। हरी कच्ची टैटियाँ पकते हुए पीली होती हैं और फिर गुलाबी। ऐसे बहुत कम फल हैं जो पक कर गुलाबी हो जाएँ गुलाबी रंग की ये टैटियाँ इतनी गुलाबी होती हैं कि जिन नाजुक टहनियों से वे लटकी होती हैं वे भी गुलाबी हो जाती हैं। यहाँ लोग इसका अचार बनाते हैं।
क्या आपने कभी टैटी का अचार खाया है?
हमने इनकी कई झाड़ियां देखीं है गुलाबी टैटियों से लदी हुईं, पहले यह चंबल अंचल में बहुतायत मात्रा में पाया जाता था अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। यह पौधा भी गरीबों की आजीविका में सहायक है। टैटी के अचार हेतु मथुरा तक के लोग मुरैना की बीहडौ में टैटी तोड़ने आते हैं और खरीद थे भी है।
मध्य प्रदेश के चंबल अंचल में पीलू के पेड़ भी धीरे-धीरे बहुत कम होते जा रहे हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन करने की आवश्यकता है। गरीब लोग इनके फल खाकर ही अपना गुजारा कर लिया करते हैं। बंजर रेगिस्तान का यह अमृत होता है। पीलू रेगिस्तान के इस फल को देसी अंगूर भी कहा जाता है। इसीलिए यहां के आम और ख़ास सभी इसे बड़े चाव से इसे खाते हैं। घर आये मेहमानों के सामने इसे परोसा जाता है और एक दूसरे को उपहार स्वरुप भी दिए जाते हैं। इसलिए इन दोनों पौधों का भी संरक्षण और संवर्धन करना आवश्यक है।
हिदुस्थान समाचार/उपेंद्र
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा