मौनी अमावस्या 18 जनवरी को, मौन, स्नान और दान से मिलता है पितृ कृपा का आशीर्वाद
भोपाल, 17 जनवरी (हि.स.)। माघ मास की अमावस्या तिथि को मौनी अमावस्या के रूप में सनातनी मानते आए इस दिन श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर दान-पुण्य करते हैं तथा मौन व्रत का पालन कर आत्म-चिंतन और साधना में लीन रहते हैं। पंचांग के अनुसार इस वर्ष मौनी अमावस्या रविवार 18 जनवरी को मनाई जाएगी।
इस संबंध में ज्योतिषाचार्य भरत चंद्र दुबे ने शनिवार को बताया कि मौनी अमावस्या पर मौन रहना सबसे बड़ा तप माना गया है। मौन से मन शांत होता है, विचारों में संयम आता है और आत्मा की शुद्धि होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि मौन साधना से वाणी की शुद्धि होती है, पापों का नाश होता है और साधक को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह व्रत मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य और ज्ञानवृद्धि का भी मार्ग प्रशस्त करता है।
उन्होंने बताया, पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि 18 जनवरी को रात 1 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ होकर 19 जनवरी तक रहेगी। इस दिन सूर्योदय सुबह सात बजकर 15 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 49 मिनट पर होगा। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र सुबह 10 बजकर 14 मिनट तक रहेगा, जिसके बाद उत्तराषाढ़ा नक्षत्र आरंभ होगा। हर्षण योग शाम 9 बजकर 11 मिनट तक रहेगा, जबकि करण चतुष्पाद दोपहर 12 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। राहुकाल दोपहर 4 बजकर 29 मिनट से 5 बजकर 49 मिनट तक रहेगा, इस अवधि में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी गई है।
वहीं, धर्माचार्य पंडित राजेश चौबे का कहना है कि मौनी अमावस्या पूर्वजों की आराधना के लिए विशेष फलदायी दिन है। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर देवता और पितृ लोक के पूर्वज धरती पर आते हैं। मौन व्रत रखकर किया गया स्नान, दान और पूजा पितरों को अत्यंत प्रसन्न करती है। इससे पितृदोष का निवारण होता है और पूर्वजों की कृपा से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
उनके अनुसार, माघ मास की यह अमावस्या प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम के साथ नर्मदा, गंगा, यमुना, काबेरी, गोरावरी में स्नान के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम में आस्था की डुबकी लगाने के साथ अन्यत्र पवित्र नदियों में स्नान करेंगे। शास्त्रों के अनुसार यदि किसी कारणवश नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर स्नान करते समय त्रिवेणी संगम का ध्यान करने से भी वही पुण्य फल प्राप्त होता है।
इसके साथ ही भागवताचार्य बृजेशचंद्र दुबे ने बताया कि मौनी अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करना अत्यंत शुभ माना गया है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल, कुश और जल से अर्घ्य देना चाहिए। इसके साथ ही पीपल के वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने का भी विशेष विधान है। भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करने से भी विशेष फल की प्राप्ति होती है।श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य अनुसार काले तिल, गुड़, घी, अन्न, चावल, आटा, गर्म वस्त्र, पका हुआ भोजन, फल और धन का दान कर सकते हैं। गरीबों, ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन कराना भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। दान को गुप्त रूप से करना श्रेष्ठ फलदायी होता है।
आचार्य ब्रजेश का कहना यह भी है कि मौनी अमावस्या का पर्व आत्मिक शुद्धि, पाप मुक्ति और मोक्ष की कामना का श्रेष्ठ अवसर है। मौन साधना, स्नान, दान और पितृ पूजा के माध्यम से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।इसके साथ ही इस बार मौनी अमावस्या पर सर्वार्थ सिद्धि योग बना है। सर्वार्थ सिद्धि योग को शुभ योगों में बहुत ही उत्तम माना गया है,क्योंकि इसे लेकर धारणा यही है कि इस योग में आप जो भी कार्य करते हैं, उसके सफल होने की संभावना अधिक रहती है। मौनी अमावस्या पर सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह में 10 बजकर 14 मिनट से बनेगा, जो 19 जनवरी को सुबह 07 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी