मप्रः पूर्व चयनित प्राथमिक शिक्षकों को हाईकोर्ट की युगलपीठ से भी झटका, सभी अपीलें खारिज

 


मध्य प्रदेश, 19 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल द्वारा आयोजित प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 में अपात्र अभ्यर्थियों को गलत तरीके से मिले 5 फीसदी बोनस अंकों के मामले में उच्च न्यायालय, जबलपुर की युगलपीठ खंडपीठ ने भी सिंगल बेंच के आदेश को सही ठहराते हुए समस्त रिट अपीलें बुधवार को खारिज कर दी हैं। इसके साथ ही पूर्व चयनित 13089 चयनित प्राथमिक शिक्षकों को दूसरा बड़ा झटका लगा है और अब नए सिरे से बनी मेरिट सूची ही लागू होगी।

नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया एवं अन्य द्वारा दायर रिट याचिका क्रमांक 12970/2026 में यह तथ्य कोर्ट के सामने रखा गया था कि भर्ती नियम पुस्तिका की कंडिका 7.7 के तहत केवल भारतीय पुनर्वास परिषद से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा डिप्लोमा धारक अभ्यर्थियों को ही 5% बोनस अंक मिलने थे, किंतु 13089 पदों की चयन सूची में लगभग 14964 अभ्यर्थियों ने खुद को इस श्रेणी में दिखाकर बोनस अंक प्राप्त कर लिया, जबकि आरसीआई के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वास्तव में केवल लगभग 5271 अभ्यर्थी ही मान्य आरसीआई योग्यता रखते थे।

मामले में सिंगल बेंच का आदेश 6 मई में न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने 6 मई को पारित आदेश में पाया था कि बोर्ड द्वारा केवल ऑनलाइन आवेदन में हाँ विकल्प चुने जाने के आधार पर बिना दस्तावेज सत्यापन के बोनस अंक दिए गए, जिससे वास्तविक और पात्र अभ्यर्थियों की मेरिट प्रभावित हुई ।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अभ्यर्थियों को सुधार हेतु पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद जिन्होंने गलत जानकारी दी, वे परिणाम आने के बाद अपने अंक कम करवाने की मांग नहीं कर सकते, क्योंकि इससे बेईमानी को बढ़ावा मिलेगा और ईमानदार अभ्यर्थी दंडित होंगे।

एकलपीठ ने राज्य शासन को चयन सूची मंडल को वापस भेजने तथा मंडल को यह निर्देश दिया कि जिन अभ्यर्थियों ने आरसीआई डिप्लोमा हेतु हाँ विकल्प चुना था उनके लिए मंडल 15 दिन की एक अतिरिक्त विंडो खोलेगा, जिसमें अभ्यर्थी अपना आरसीआई मान्यता प्राप्त विशेष डी.एल.एड. डिप्लोमा अपलोड कर सकेंगे, तत्पश्चात मंडल अपनी सत्यापन प्रक्रिया पूर्ण करेगा जिन्होंने प्रमाण पत्र अपलोड नहीं किया, उनका आवेदन निरस्त कर तीन माह की अवधि में संशोधित मेरिट सूची तैयार कर नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, इस आदेश को प्रभावित पक्षों ने डबल बेंच में अपील दाखिल कर चुनौती दी थी ।

मामले में अपीलार्थियों का तर्क था कि उनके पास वास्तव में आरसीआई डिप्लोमा नहीं है, हाँ विकल्प चुनना केवल भूलवश हुआ था, और वे बोनस अंक की मांग नहीं कर रहे बल्कि केवल वास्तविक अंकों के आधार पर अपनी चयन प्रक्रिया में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं। कुछ अपीलार्थियों ने स्वयं को दिव्यांग श्रेणी का बताते हुए सहानुभूतिपूर्वक विचार किए जाने का अनुरोध भी किया।

न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने यह पाया कि नियम पुस्तिका के अनुसार सुधार हेतु अभ्यर्थियों को तीन अलग-अलग अवसर दिए गए थे, पहला 25 अगस्त से 26 अगस्त 2025 तक, दूसरा दीपक परमार प्रकरण में पारित आदेश के अनुपालन में 26 दिसंबर 2025 से 10 जनवरी 2026 तक, तथा तीसरा डीपीआई के निर्देश पर 4 फरवरी से 11 फरवरी 2026 तक। इसके बावजूद अपीलार्थियों ने अपनी जानकारी सुधार हेतु प्रस्तुत नहीं की।

खंडपीठ ने अपने आदेश में यह टिप्पणी की कि परिणाम घोषित होने के बाद जब अभ्यर्थियों को यह पता चला कि बोनस अंक हटाए जाने पर भी वे मेरिट में आ रहे हैं, तभी उन्होंने गलती को भूलवश बताते हुए सुधार की मांग की, जो कि स्वीकार्य नहीं है । खंडपीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभ्यर्थियों द्वारा जानबूझकर गलत जानकारी देकर बोनस अंक प्राप्त करना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है और सर्वमान्य विधिक सिद्धांत के अनुसार धोखाधड़ी किसी भी वैध कार्यवाही को निरस्त कर देती है ।

इस संदर्भ में कोर्ट ने महेश कुमार बाथम बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम प्रकरण सहित सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त किसी भी लाभ के आधार पर बाद में समानता के सिद्धांत पर राहत नहीं मांगी जा सकती । खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस स्तर पर प्रक्रिया को पुनः खोलने से हजारों अभ्यर्थियों की अंतर-वरीयता प्रभावित होगी तथा उन अभ्यर्थियों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा जिन्होंने सही जानकारी देकर चयन प्राप्त किया है । अंततः खंडपीठ ने पाया कि एकलपीठ के आदेश में तथ्य या विधि संबंधी कोई त्रुटि नहीं है, और समस्त रिट अपीलें बिना किसी आधार के पाते हुए खारिज कर दीं।

मूल याचिका में याचिकाकर्ताओं तथा रिट अपीलों में उत्तरदाताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा एवं अधिवक्ता विशाल बघेल ने पैरवी की ।

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हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक