एनएचएआई द्वारा ब्याज रोकने पर की जाएगी कार्रवाई : हाईकोर्ट

 


जबलपुर, 06 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण के मामलों में मुआवजा और उस पर देय वैधानिक ब्याज के भुगतान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना किसी वैधानिक आधार के ब्याज रोकने का अधिकार किसी भी प्राधिकरण को नहीं है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि भविष्य में यदि अधिकारियों द्वारा इस प्रकार की लापरवाही दोहराई गई तो उनके विरुद्ध विजिलेंस जांच के आदेश भी दिए जा सकते हैं।

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विनेय सराफ की खंडपीठ ने यह टिप्पणी रीवा निवासी आभा सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ता की 0.088 हेक्टेयर भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। भूमि अधिग्रहण प्राधिकारी ने 30 जुलाई 2013 को 56 लाख 37 हजार 630 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि निर्धारित मुआवजे में से 37 लाख 18 हजार 680 रुपये का भुगतान 18 जुलाई 2026 को किया गया, जबकि वैधानिक ब्याज का भुगतान लंबित रहा। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से अधिवक्ता मोहन सौसरकर ने दलील दी कि याचिकाकर्ता द्वारा मुआवजा बढ़ाने के लिए आवेदन दिए जाने के कारण भुगतान में विलंब हुआ। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि एनएचएआई ने अवार्ड को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी थी और न ही कोई स्थगन आदेश प्राप्त किया था।

इस पर खंडपीठ ने कहा कि जब अवार्ड प्रभावी था और उस पर कोई रोक नहीं थी, तब मुआवजा तथा वैधानिक ब्याज रोकने का कोई औचित्य नहीं था। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता संपूर्ण वैधानिक ब्याज की हकदार हैं।

सुनवाई के दौरान एनएचएआई की ओर से दो सप्ताह के भीतर पूरा वैधानिक ब्याज देने का आश्वासन दिया गया। इसके अनुसार पहले वर्ष के लिए नौ प्रतिशत तथा उसके बाद वास्तविक भुगतान तक 15 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज का भुगतान किया जाएगा। इस आश्वासन के आधार पर हाई कोर्ट ने याचिका का निराकरण करते हुए स्पष्ट किया कि तय समय में भुगतान नहीं होने पर याचिकाकर्ता पुनः आवेदन देकर याचिका बहाल करा सकती हैं।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक