सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण का स्वास्थ्य संगठनों ने किया विरोध, बोले- फैसला वापस ले सरकार, नहीं तो होगा आंदोलन
भोपाल, 05 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) के संचालन को निजी संस्थाओं के हवाले करने के फैसले का स्वास्थ्य कर्मियों, डॉक्टरों और जनस्वास्थ्य से जुड़े संगठनों ने विरोध किया है। रविवार को भोपाल में आयोजित संयुक्त पत्रकार वार्ता में संगठनों ने सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय निजीकरण की नीति अपनाई जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया तो आंदोलन किया जाएगा।
दरअसल, प्रदेश सरकार ने ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के संचालन के लिए निजी भागीदारी (पीपीपी मॉडल) को मंजूरी दी है। हाल ही में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकृति मिली थी। पहले चरण में रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है।
पत्रकार वार्ता में एमपी मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आनंद शर्मा ने कहा कि मध्यप्रदेश पहले ही मातृ मृत्यु दर जैसे स्वास्थ्य संकेतकों में चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है। ऐसे में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का निजीकरण स्वास्थ्य सेवाओं को और प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को निजीकरण के बजाय डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के रिक्त पद भरने तथा सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। डॉ. शर्मा ने आशंका जताई कि सरकारी संस्थानों के निजीकरण से पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित हो सकती है। इसलिए सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
वहीं, मध्यप्रदेश मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीय ने कहा कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल उपचार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी), पोस्टमार्टम और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य भी किए जाते हैं। इनकी रिपोर्ट अदालतों में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत होती है। ऐसे में यदि इन सेवाओं का संचालन निजी संस्थाओं के हाथों में जाता है तो उनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल खड़े हो सकते हैं।
संगठनों ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार चाहती है तो उसे स्वास्थ्य बजट में वृद्धि करनी चाहिए, रिक्त पदों पर नियमित भर्ती करनी चाहिए और सरकारी अस्पतालों को आधुनिक संसाधनों एवं पर्याप्त स्टाफ से सशक्त बनाना चाहिए। उनका कहना है कि निजीकरण से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्तमान में 55 जिला अस्पताल, 51 सिविल अस्पताल, 158 उप जिला/सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 10,256 उप स्वास्थ्य केंद्र तथा पांच पॉलीक्लिनिक संचालित हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे