अनूपपुर: विदेशी फंड से पोषित वैकल्पिक राजनीति भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती-डीन प्रो. विकास
अनूपपुर, 14 अक्टूबर (हि.स.)। आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीमा पर नहीं, बल्कि विचार के मोर्चे पर है। विदेशी धन से पोषित “वैकल्पिक राजनीति” राजनीतिक दलों से बाहर एक समानांतर ढाँचा खड़ा करती है। इसमें कुछ युवा समूह, सोशल मीडिया नेटवर्क और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से गढ़े गए नैरेटिव शामिल होते हैं, जो छोटे स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आक्रोश में बदल देते हैं। जब किसी देश में विपक्ष दिशाहीन होता है, तब यही ढाँचा सत्ता को अस्थिर करने का औजार बनता है। भारत अनेक वैश्विक मुद्दों पर विदेशी दबाव के आगे नहीं झुक रहा है, इसलिए यहाँ भी ऐसे प्रयास तेज हुए हैं।
यह बातें बुधवार को मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के अमरकंटक में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला सह संगोष्ठी के शुभारंभ में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहें कंप्यूटर विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता एवं स्वदेशी शोध संस्थान के राष्ट्रीय सचिव प्रो. विकास सिंह ने कहीं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख कैलाश चंद्र, की। विशेष अतिथि के रूप में कार्य परिषद सदस्य प्रो. अभिलाषा सिंह उपस्थित रहीं।
प्रो. विकास सिंह ने बताया कि वर्ष 2000 से 2025 के बीच सर्बिया, जॉर्जिया, ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यूक्रेन, सूडान, बोलीविया, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और मेडागास्कर सहित 20 देशों में जन-आंदोलनों के बाद सत्ता बदली। इन आंदोलनों की पद्धति लगभग एक जैसी रही, जिसमें प्रतीक और नारे गढ़े गए, सोशल मीडिया से रातोंरात भीड़ जुटाई गई, नेतृत्वहीन दिखने वाला संगठन खड़ा किया गया और दमन की हर घटना को आक्रोश में बदल दिया गया। सबसे बड़ा सबक सत्ता-परिवर्तन के बाद की तस्वीर में है। अध्ययन के अनुसार 20 में से 13 देशों में स्थिर और जवाबदेह शासन की मूल माँग आज तक अधूरी है। लीबिया दो सत्ताओं में बँटकर विदेशी सेनाओं का अखाड़ा बन गया, सूडान गृहयुद्ध में झुलस रहा है जहाँ एक करोड़ बीस लाख से अधिक लोग विस्थापित हैं, और बुर्किना फ़ासो तथा मेडागास्कर में सैन्य शासन आ गया। ऐसे देश विदेशी शक्तियों और वैश्विक बाजार के चंगुल में फँसकर लगभग पराधीनता जैसी स्थिति में पहुँच गए। भारत को इनसे सावधान रहकर अपना लोकतंत्र और विकास-यात्रा सुरक्षित रखनी है।
यूजीसी ना तो अधिनियम है और ना ही कानून! बल्कि एक विनियम है
प्रो. सिंह ने भारत के वर्तमान परिदृश्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि हाल के महीनों में परीक्षा, चुनाव आयोग और शिक्षा-नियमों जैसे विषयों को सोशल मीडिया पर अधूरी और भ्रामक जानकारी के साथ उछाला गया। यूजीसी के समता विनियम 2026 को “यूजीसी बिल” और “काला क़ानून” कहकर समाज के वर्गों को आपस में लड़ाने का प्रयास हुआ। सच्चाई यह है कि यह न विधेयक है और न संसद से पारित क़ानून, बल्कि यूजीसी का विनियम है। इसकी नींव 2007 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा गठित थोराट समिति ने रखी थी, और यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के क्रम में आगे बढ़ा। विदेश मंत्री का डीपफेक वीडियो, एक प्रसिद्ध अभिनेता की नकली आवाज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रची गई भीड़ और भारत का बताकर फैलाए गए विदेशों के पुराने वीडियो पकड़े हैं। डीप-एआई के युग में सबसे घातक हथियार आधा-सच है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि हर वायरल दावे को आधिकारिक दस्तावेज़ और तथ्य की कसौटी पर परखें।
प्रो. विकास सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सही उपयोग का प्रश्न उठाते हुए कहा कि भारत में लगभग 10 करोड़ साप्ताहिक उपयोगकर्ता हैं और हम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार हैं, पर विनिर्माण और इंजीनियरिंग में इसका उपयोग नगण्य है। विश्व में आज ऐसा कोई एआई नहीं है जो इंजन, वस्त्र-मशीन, ट्रांसफॉर्मर, रेल कोच या दवा-संयंत्र को स्वयं पूरा डिज़ाइन कर सके। इसका अर्थ है कि यह मैदान अभी पूरी दुनिया के लिए खुला है। प्रो. सिंह ने सुझाव दिया कि भारत-एआई-मिशन में इंजीनियरिंग एवं विनिर्माण हेतु एआई का आठवाँ स्तंभ और उत्कृष्टता केंद्र जोड़ा जाए, ताकि एआई समय बिताने का साधन न रहकर तकनीक-विकास, तकनीक-प्रसार और जन-कल्याण का माध्यम बने। नीति आयोग के अनुसार एआई से 2035 तक अर्थव्यवस्था में 500 से 600 अरब डॉलर जुड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि विकसित भारत 2047 के संकल्प से कुछ विदेशी शक्तियाँ बौखलाई हुई हैं, और जागरूक युवा ही उनकी चालों को विफल करेंगे।
वैश्विक बाज़ार शक्तियां कल्चरल मार्क्सिज़्म को पोषित करते हैं- कैलाश चंद्र
कैलाश चंद्र ने कल्चरल मार्क्सिज़्म और वैश्विक बाजार शक्तियों, पर कहा कि किसी राष्ट्र की संस्कृति बदल दी जाए, तो उसका बाजार अपने-आप दूसरों के हाथ चला जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ केवल उत्पाद नहीं बेचतीं, बल्कि विज्ञापन, फिल्मी सितारों और इन्फ़्लुएंसरों के माध्यम से नई “परंपराएँ” और जीवन-शैली गढ़ती हैं। भारत का विज्ञापन बाजार 1 लाख 55 हजार करोड़ रुपये पार कर चुका है और टीवी के हर चार में से एक से अधिक विज्ञापन किसी सितारे के चेहरे से चलता है। परिवारों के खर्च में प्रसंस्कृत खाद्य का हिस्सा लगातार बढ़ा है, मोटापे की दर पंद्रह वर्षों में दोगुनी होकर 24 प्रतिशत हो गई है, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने एक ही वर्ष में 6,737 करोड़ रुपये की रॉयल्टी विदेश भेजी है। उन्होंने कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी और सामाजिक समरसता को भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक सुरक्षा का आधार बताया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डॉ. दिग्विजय फुकन, डॉ. धर्मेंद्र झरिया, डॉ संदीप खरे, डॉ राकेश सोनी, डॉ ज्ञान, विभाग प्रचारक कमल राठौर, डॉ. कमलेश पांडे, डॉ. चिन्मय पांडे, डॉ. ऋतुराज, अनुराग सिंह, गुप्तेश्वर प्रजापति, रंजन कुमार, रामबाबू कोठार, ओमप्रकाश पाठक, खेलन सिंह, हीरा सिंह, कुर्रे, विशाल ताम्रकार, रोहित श्रीवास, गायत्री राजपूत, प्रशांत अग्रवाल, नितिन मिश्रा, अंशुल सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला