अनूपपुर: जालेश्वर महादेव के दर्शन से पूरी होती है हर मनोकामना
श्रावण मास के अंतिम सोमवार पर विशेष
अनूपपुर, 23 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की पवित्र नगरी अमरकंटक की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित जलेश्वर महादेव धाम आस्था, अध्यात्म और पौराणिक मान्यताओं का अद्भुत संगम है। अमरकंटक से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह प्राचीन तीर्थस्थल भगवान शिव की आराधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। विशेषकर श्रावण मास में यहां श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ पड़ती है। मान्यता है कि सच्चे मन से जलेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन करने तथा मां नर्मदा के पवित्र जल से अभिषेक करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
पंडित संदीप ज्योतिषी के अनुसार, जलेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। अमरकंटक क्षेत्र को आदिकाल से ही देवभूमि और ऋषि-मुनियों की तपस्थली के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। यही कारण है कि यहां के प्रत्येक पर्वत, सरोवर और जलधारा के साथ कोई न कोई धार्मिक एवं आध्यात्मिक कथा जुड़ी हुई है।
त्रिपुरासुर के संहार से जुड़ी है जलेश्वर धाम की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, तारकासुर के तीन पुत्रों ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या कर त्रिपुर नामक तीन पुरियों की रचना कराई थी। तीनों के अत्याचारों से देवता और ऋषि-मुनि अत्यंत पीड़ित हुए और उन्होंने भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का संहार किया। मान्यता है कि उस समय तीनों पुरियां जलकर भस्म हो गईं। इसी दिव्य घटना से अमरकंटक क्षेत्र में जलेश्वर महादेव की महिमा जुड़ी हुई मानी जाती है। धार्मिक परंपरा में यह भी कहा जाता है—“तत्र जलेश्वर नाम पर्वते अमरकंटके”, अर्थात अमरकंटक के पर्वत पर जलेश्वर नामक पवित्र तीर्थ का प्राकट्य हुआ।
जोहिला नदी के उद्गम से भी जुड़ा है यह पवित्र क्षेत्र
अमरकंटक को तीन पवित्र नदिया नर्मदा, सोन और जोहिला की उद्गमभूमि होने का गौरव प्राप्त है। जलेश्वर महादेव मंदिर के निकट ही जोहिला नदी का उद्गम स्थल माना जाता है।
पंडित संदीप ज्योतिषी बताते हैं कि पौराणिक कथा के अनुसार त्रिपुरासुर के संहार के पश्चात एक प्रचंड ज्वाला धरती पर आ गिरी। उसकी भयावहता से देवताओं को लगा कि कहीं सृष्टि का विनाश न हो जाए। उन्होंने भगवान शिव से उस ज्वाला को शांत करने की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने उस ज्वाला को जलधारा में परिवर्तित कर दिया, जो आगे चलकर जोहिला नदी के रूप में प्रवाहित हुई। इसी कारण इस नदी को भगवान शिव की कृपा से उत्पन्न पवित्र जलधारा के रूप में श्रद्धा से देखा जाता है।
नर्मदा जल से अभिषेक का विशेष महत्व
जलेश्वर महादेव की आराधना में मां नर्मदा के जल का विशेष महत्व माना गया है। श्रद्धालु नर्मदा उद्गम कुंड से पवित्र जल लेकर जलेश्वर महादेव को अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि नर्मदा जल से भगवान शिव का अभिषेक करने से भक्त को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
पंडित संदीप ज्योतिषी के अनुसार, “मां नर्मदा कुंड का जल लाकर जलेश्वर महादेव को अर्पित करने की परंपरा अत्यंत श्रद्धापूर्ण मानी जाती है। भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं और भगवान शिव से सुख, शांति एवं समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।”
श्रावण मास में तो इस आस्था का स्वरूप और भी विराट हो जाता है। दूर-दूर से श्रद्धालु नर्मदा जल लेकर जलेश्वर महादेव के दर्शन करने पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध एवं अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं।
बाणलिंग और महा रुद्र मेरु की धार्मिक मान्यता
जलेश्वर महादेव में प्रतिष्ठित शिवलिंग को लेकर भी अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यहां स्थापित बाणलिंग अत्यंत प्राचीन और दिव्य है। स्कंद पुराण सहित विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अमरकंटक क्षेत्र की महिमा का वर्णन मिलता है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जलेश्वर महादेव पर श्रद्धापूर्वक जल एवं दुग्ध अर्पित करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। पुराणों में इस पवित्र क्षेत्र को “महा रुद्र मेरु” के रूप में भी संबोधित किए जाने की धार्मिक मान्यता है।
श्रावण के अंतिम सोमवार पर उमड़ती है आस्था
श्रावण मास भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। मास के अंतिम सोमवार को जलेश्वर महादेव धाम में श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर पहुंच जाती है। भक्त प्रातःकाल से ही भगवान शिव के दर्शन, जलाभिषेक और पूजन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र “हर-हर महादेव” और “नर्मदे हर” के जयघोष से गुंजायमान हो उठता है।
जलेश्वर धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि अमरकंटक की आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां प्रकृति, नदी, पर्वत और शिव आराधना एक-दूसरे में ऐसे समाहित दिखाई देते हैं, मानो स्वयं प्रकृति भगवान शिव की आराधना कर रही हो। श्रावण के अंतिम सोमवार के इस पावन अवसर पर जलेश्वर महादेव के चरणों में पहुंचने वाला प्रत्येक श्रद्धालु अपने मन की कामना लेकर आता है और विश्वास के साथ लौटता है कि भोलेनाथ उसकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार करेंगे।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला