शहडोल: एमए पास दुर्गा सिंह ने हुनर को बनाया अपनी ताकत, लकड़ी की कलाकारी से संवार रहीं भविष्य

 




शहडोल, 25 अक्टूबर (हि.स.)। परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, यदि व्यक्ति के भीतर कुछ नया सीखने और आगे बढ़ने का जज्बा हो, तो वह अपने हुनर से नई राह बना सकता है। शहडोल जिले के छतवई गांव की दुर्गा सिंह इसकी प्रेरक मिसाल हैं।

मनोविज्ञान विषय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर चुकीं दुर्गा ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने अपने हाथों के हुनर को आजीविका का माध्यम बनाया और अब काष्ठ शिल्प यानी लकड़ी पर कलाकारी के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

दुर्गा सिंह ने वर्ष 2019 में मनोविज्ञान विषय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण आगे की पढ़ाई और तैयारी में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। परिवार की जिम्मेदारियों को समझते हुए उन्होंने आत्मनिर्भर बनने के लिए विभिन्न हुनर सीखने का निर्णय लिया।

सिलाई-बुनाई से शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफर

दुर्गा ने सबसे पहले सिलाई और बुनाई का काम सीखा। इसके बाद उन्होंने ब्यूटी पार्लर का काम सीखने का भी प्रयास किया। हालांकि, इन कार्यों से अपेक्षित आमदनी नहीं हो पा रही थी और प्रशिक्षण की लागत भी उनके लिए चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने नए अवसरों की तलाश जारी रखी।

इसी दौरान दुर्गा छतवई स्थित हथकरघा एवं हस्तशिल्प केंद्र पहुंचीं, जहां उन्होंने गोंडी चित्रकला का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। चित्रकला सीखने के दौरान उनकी रुचि और बढ़ी। बाद में उन्होंने महसूस किया कि लकड़ी पर कलाकारी के क्षेत्र में भी वह अपनी प्रतिभा का बेहतर उपयोग कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने काष्ठ शिल्प सीखना शुरू कर दिया।

लकड़ी के टुकड़ों में उकेर रहीं अपनी प्रतिभा

काष्ठ शिल्प के क्षेत्र में कदम रखे दुर्गा को अभी लगभग एक माह ही हुआ है, लेकिन इस कम समय में उन्होंने अपने काम से लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। लकड़ी पर बारीक कलाकारी, चित्रांकन और आकर्षक आकृतियां तैयार करने में उनकी रुचि लगातार बढ़ रही है।

दुर्गा सिंह ने बताया कि लकड़ी पर कलाकारी के काम से उन्हें अब आमदनी होने लगी है। वर्तमान में वह इस कार्य से लगभग 6 से 8 हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही हैं। उन्होंने बताया कि यदि वह इस काम पर अधिक समय दें और अपने हुनर को लगातार निखारें, तो आने वाले समय में आमदनी बढ़ाने के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।

उन्होंने बताया कि काष्ठ शिल्प ऐसा क्षेत्र है, जिसमें मेहनत, अभ्यास और कलात्मक कौशल के माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है। यही कारण है कि अब वह इस कला में दक्षता हासिल करने और इसे अपने करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर विशेष ध्यान दे रही हैं।

गोंडी चित्रकला ने निखारी काष्ठ शिल्प की समझ

दुर्गा सिंह ने बताया कि गोंडी चित्रकला का प्रशिक्षण भी उनके लिए उपयोगी साबित हो रहा है। इस प्रशिक्षण से उन्हें रेखांकन, आकृतियां बनाने और रंगों के संयोजन को समझने में मदद मिली है। लकड़ी पर कलाकृति तैयार करने से पहले उसकी रूपरेखा बनानी होती है। ऐसे में चित्रकला का ज्ञान उनके काम आ रहा है।

उन्होंने बताया कि वह लकड़ी से तैयार होने वाली कलाकृतियों में अपनी कल्पनाशीलता और चित्रांकन के कौशल का इस्तेमाल कर रही हैं। इस तरह उनके द्वारा सीखे गए अलग-अलग हुनर एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं और उन्हें अपनी कला को बेहतर बनाने का अवसर मिल रहा है।

परिवार की जिम्मेदारियां बनीं आगे बढ़ने की प्रेरणा

दुर्गा सिंह ने बताया कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य है। उनकी माता गृहिणी हैं, जबकि पिता मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं। परिवार में तीन बहनें और एक भाई हैं। दो बहनों का विवाह हो चुका है। दुर्गा फिलहाल अपने करियर को स्थापित करने और परिवार की जिम्मेदारियों में सहयोग करने पर ध्यान दे रही हैं।

उन्होंने बताया कि वह सरकारी नौकरी के लिए भी प्रयासरत हैं और समय-समय पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवेदन करती रहती हैं। इसके साथ ही उन्होंने काष्ठ शिल्प के माध्यम से अपनी आजीविका मजबूत करने का लक्ष्य तय किया है। उनके लिए यह कला केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने और अपनी प्रतिभा को पहचान दिलाने का अवसर भी है।

प्रशिक्षक ने भी सराहा दुर्गा का हुनर

छतवई स्थित हथकरघा एवं हस्तशिल्प केंद्र के प्रभारी शिवशंकर पांडे ने बताया कि दुर्गा में काष्ठ शिल्प सीखने की अच्छी क्षमता है। उनके काम के प्रति लगन, सीखने की इच्छा और कलात्मक समझ उल्लेखनीय है। उन्होंने बताया कि दुर्गा शुरुआत में गोंडी चित्रकला सीखने केंद्र आई थीं, लेकिन बाद में काष्ठ शिल्प में भी उनकी रुचि विकसित हुई।

शिवशंकर पांडे ने बताया कि लकड़ी पर कलाकारी के लिए रेखांकन, कटाई, औजारों के संचालन और हाथों के संतुलन की आवश्यकता होती है। दुर्गा इन बारीकियों को सीखने में रुचि दिखा रही हैं और कम समय में उनके काम में अच्छी प्रगति दिखाई दे रही है।

काष्ठ शिल्प में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

हथकरघा एवं हस्तशिल्प केंद्र के प्रभारी शिवशंकर पांडे ने बताया कि छतवई केंद्र में वर्तमान में 12 महिलाएं काष्ठ शिल्प का प्रशिक्षण ले रही हैं, जबकि 17 पुरुष इस कार्य से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि महिलाओं और युवतियों की इस कला के प्रति बढ़ती रुचि उन्हें नए कौशल सीखने और आजीविका के अवसर तलाशने का मंच प्रदान कर रही है।

दुर्गा सिंह की यात्रा यह दर्शाती है कि शिक्षा, हुनर और निरंतर प्रयास एक साथ मिलकर आत्मनिर्भरता की राह तैयार कर सकते हैं। आर्थिक कठिनाइयों के बीच उन्होंने सीखना नहीं छोड़ा और अब अपनी मेहनत से आगे बढ़ने का प्रयास कर रही हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला