भोपालः भारतीय भाषा परिवार विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
- भाषा विचारों ही नहीं, अपितु संस्कृति की भी वाहकः अशोक पाण्डेय
भोपाल, 10 जनवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान(आईईएचई), में भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार), नई दिल्ली एवं भारतीय शिक्षण मंडल, मध्य भारत प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में 'भारतीय भाषा परिवार' विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शनिवार को शुभारंभ हुआ।
मुख्य अतिथि के रूप में मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में भाषा को विचारों की ही नहीं, अपितु संस्कृति की भी वाहक बताया। उन्होंने विधि जगत में न्यायाधीश के रूप में प्राप्त अनुभवों के आधार पर हिंदी अनुवाद व उससे उत्पन्न भ्रान्तियों से अवगत करवाया। साथ ही स्वभाषा व स्वसंस्कृति के जीवन में महत्व को भी विस्तारित रूप से इंगित किया।
बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के पूर्व कुलपति डॉ. प्रकाश बरतुनिया ने 'विश्व हिंदी दिवस' व 'हिंदी दिवस' मनाने के औचित्य व उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए हिंदी भाषा की दृढ़ वैश्विक स्थिति का वर्णन किया। उन्होंने भाषिक एकता के लिए प्रत्येक भारतीय को भारत देश के विभिन्न प्रांतों की भाषाएं सीखने पर बल दिया।
प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कान्हेरे ने स-उदाहरण अनुवाद की समस्याओं से अवगत कराया। डॉ. कान्हेरे ने भारत के बहुभाषिक परिदृश्य में अनुवाद की महती भूमिका को रेखांकित करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, गूगल लैंस एवं अनुवादिता एप्प जैसी तकनीकों के अनुवाद की समस्याओं को रेखांकित किया। साथ ही मराठी भाषा की पृष्ठभूमि व समृद्ध साहित्य परंपरा को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने अनुवाद को राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता के लिए अनिवार्य सिद्ध किया। डॉ. एच.बी. गुप्ता ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए संगोष्ठी के आगामी सत्रों की रुपरेखा से परिचित करवाया।
संस्थान के संचालक डॉ. प्रज्ञेश कुमार अग्रवाल ने रामायण में हनुमान जी की सीता माता से भेंट के समय प्राकृत भाषा में वार्तालाप करने के उदाहरण द्वारा स्वाभाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने एक से अधिक भारतीय भाषाओं को सीखने के महत्व को व्याख्यायित करते हुए जानकारी साझा की, कि मध्य प्रदेश शासन 11 भारतीय भाषाओं में निःशुल्क प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रमों को आरम्भ करने जा रहा है, जिस हेतु नोडल सेंटर बनने का सौभाग्य उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल को प्राप्त हुआ है।
संगोष्ठी के प्रथम-सत्र के मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक प्रो. चंद्र एस. दुबे ने अंग्रेजों की पद्धति से वर्गीकृत भारतीय भाषाओं व उनकी संरचनाओं को भारत के भाषिक विवाद हेतु उत्तरदायी बताया एवं भारतीय दृष्टि से सभी भारतीय भाषाओं के अध्ययन व साहित्य-अनुवाद पर बल दिया।
द्वितीय सत्र को संचालित करते हुए आई.आई.एम.सी के रीजनल डायरेक्टर डॉ. दिलीप कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय भाषाएँ साझा सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक परंपरा के कारण एक सजीव भारतीय भाषा-परिवार का निर्माण करती हैं। उन्होंने भारतीय भाषाओं के अध्ययन हेतु पश्चिमी ढाँचों के स्थान पर स्वदेशी भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी के तृतीय व अंतिम पैनल-सत्र हेतु दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान, भोपाल के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा एवं प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, भोपाल के प्राचार्य डॉ. अनिल शिवानी उपस्थित रहे। भारतीय भाषा परिवार व विभिन्न भाषाओं के महत्व पर विद्वानों ने अपने उपयोगी विचार व्यक्त किये। संगोष्ठी के सहभागियों व विद्यार्थियों ने भी विषय पर मुख्य वक्ताओं से अपने-अपने प्रश्न पूछकर जिज्ञासाओं को साझा किया। संगोष्ठी का प्रथम दिवस भारतीय भाषा परिवार की विविध भाषाओं को समझने, अनुवाद की समस्याओं से अवगत होने व समाधान प्राप्त करने की दिशा में सार्थक सिद्ध हुआ। इस दौरान डॉ. मनीष शर्मा सहित अन्य प्राध्यापकगण भी उपस्थित थे।
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर