बड़वानी : 150 फीट पहाड़ काटकर सड़क बना रहे ग्रामीण, ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की याद दिला रहा जज्बा

 


बड़वानी, 09 जून (हि.स.)। बिहार के ‘माउंटेन मैन’ की कहानी अब मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में साकार होती नजर आ रही है। वर्षों तक सड़क की मांग पूरी नहीं होने और नेताओं-अधिकारियों के आश्वासनों से निराश ग्रामीणों ने अब खुद ही अपने गांव तक रास्ता बनाने की जिम्मेदारी उठा ली है। खेड़ी पलास फलियां गांव के लोग इन दिनों करीब 150 फीट ऊंचे पहाड़ को काटकर सड़क तैयार करने में जुटे हैं।

करीब 250 से 300 आबादी वाले इस आदिवासी गांव में भीषण गर्मी के बावजूद बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरुष बारी-बारी से कुदाल और फावड़ा लेकर काम कर रहे हैं। गांव में हर दिन 35 से 40 लोग बिना किसी बुलावे के सड़क निर्माण में हाथ बंटा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब इंतजार नहीं, बल्कि अपने दम पर बदलाव लाने का वक्त है।

खतरनाक रास्ते ने बढ़ाई मुश्किलें

दरअसल, गांव मुख्य सड़क से लगभग 3 किलोमीटर अंदर स्थित है। इसमें करीब 1 किलोमीटर कच्ची पगडंडी और 2 किलोमीटर का बेहद कठिन पहाड़ी रास्ता शामिल है। यही कारण है कि बारिश के मौसम में गांव का संपर्क लगभग टूट जाता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और मरीजों को अस्पताल पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता।

बड़वानी से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचने के लिए मुख्य सड़क से करीब 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ग्रामीणों ने एक सप्ताह पहले पहाड़ काटने का काम शुरू किया और अब तक करीब आधे रास्ते की खुदाई पूरी कर ली है। यहां लगभग पांच फीट चौड़ी सड़क बनाई जा रही है।

गर्भवती महिलाओं और मरीजों को झोली में ले जाना पड़ता है

गांव की रेवती बाई बताती हैं कि सड़क नहीं होने का सबसे बड़ा असर महिलाओं और बीमार लोगों पर पड़ता है। गर्भवती महिलाओं या गंभीर मरीजों को कपड़े की झोली बनाकर कई लोग मिलकर पहाड़ी रास्तों से नीचे तक ले जाते हैं। एक मरीज को सुरक्षित बाहर निकालने में करीब आठ लोगों की जरूरत पड़ती है और इसमें ढाई से तीन घंटे तक लग जाते हैं। खाद, बीज और राशन भी लोगों को सिर पर ढोकर लाना पड़ता है।

गांववालों ने खुद जुटाया एक लाख रुपये

ग्रामीण साब्जिया आदिवासी के मुताबिक, सालों तक जनसुनवाई और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद भी जब सड़क नहीं बनी तो गांव में बैठक कर खुद रास्ता बनाने का फैसला लिया गया। सक्षम परिवारों ने 10-10 हजार रुपये का योगदान दिया, जबकि अन्य लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार मदद की। इस तरह करीब एक लाख रुपये इकट्ठा किए गए।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण का आधा काम श्रमदान से पूरा कर लिया गया है, जबकि बाकी हिस्से में जेसीबी मशीन लगाकर काम पूरा किया जाएगा। हालांकि गांव तक मशीन पहुंचाना भी चुनौती बना हुआ है।

“कच्ची सड़क हम बना रहे, पक्की सरकार बना दे”

ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ रास्ता बनाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को यह दिखाना भी है कि अगर सरकार ध्यान नहीं दे तो लोग अपने स्तर पर भी बदलाव ला सकते हैं। वे बारिश शुरू होने से पहले किसी तरह आवाजाही लायक कच्ची सड़क बनाना चाहते हैं, ताकि वाहन गांव तक पहुंच सकें। लोगों ने प्रशासन से इस सड़क को पक्का करने की मांग भी की है।

प्रशासन का क्या कहना है?

ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (MPRRDA) के महाप्रबंधक अंकित अवस्थी का कहना है कि क्षेत्र को मुख्यमंत्री मजरा-टोला सड़क योजना में शामिल किया गया है। सर्वे प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और 100 से अधिक आबादी वाले क्षेत्रों को सड़क नेटवर्क से जोड़ने की योजना पर काम किया जा रहा है।

वहीं, बड़वानी एसडीएम भूपेंद्र रावत ने बताया कि संबंधित बस्ती वन क्षेत्र में आती है। मामले की जांच की जा रही है और जिन बसाहटों में सड़क सुविधा नहीं है, उन्हें सड़क परियोजनाओं में शामिल करने की प्रक्रिया जारी है।

हिन्दुस्थान समाचार / Rajesh Rathore