विलुप्त होती क्षेत्रीय बोलियों को बचाने उठी आवाज, बघेली, बुंदेली और मालवी के लिए अलग साहित्य अकादमियों की मांग
भोपाल, 04 अक्टूबर (हि.स.)। बदलते समय, शिक्षा और संचार के बढ़ते प्रभाव के बीच मध्य प्रदेश की समृद्ध क्षेत्रीय बोलियों के संरक्षण को लेकर मांग तेज होने लगी है। बघेली, बुंदेली और मालवी जैसी लोकभाषाएं प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान, लोकस्मृति और पीढ़ियों से चली आ रही जीवन परंपराओं की महत्वपूर्ण वाहक हैं। इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए अब राज्य सरकार से पृथक साहित्य अकादमियों की स्थापना की मांग उठी है।
अखिल भारतीय कुशवाहा महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राम विश्वास कुशवाहा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से अपील की है कि मध्य प्रदेश में बघेली, बुंदेली और मालवी साहित्य अकादमियों की स्थापना की जाए। उनका कहना है कि इन अकादमियों के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के साहित्य, लोककथाओं, लोकगीतों, कहावतों, मुहावरों और सांस्कृतिक परंपराओं को व्यवस्थित रूप से संरक्षित किया जा सकेगा।
भाषा के साथ जुड़ी है लोकसंस्कृति की पहचान
राम विश्वास कुशवाहा ने कहा कि मध्य प्रदेश विविध भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं वाला प्रदेश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट बोलियां हैं, जिनमें स्थानीय समाज का इतिहास, जीवन अनुभव, लोकज्ञान और सांस्कृतिक चेतना सुरक्षित है। बघेली, बुंदेली और मालवी भी इसी समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि किसी बोली का महत्व उसके शब्दों तक सीमित नहीं होता। उसके साथ लोकगीत, लोककथाएं, धार्मिक आख्यान, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति और स्थानीय जीवन शैली जुड़ी होती है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने वाली कहावतें और मुहावरे समाज के अनुभवों का संचित रूप होते हैं।
लोकगीतों और लोककथाओं में जीवित है परंपरा
मध्य प्रदेश में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर क्षेत्रीय बोलियों में लोकगीत, भजन, कीर्तन और पारंपरिक गीत गाने की परंपरा रही है। विवाह, जन्म, फसल, धार्मिक उत्सव और दूसरे सामुदायिक आयोजनों में स्थानीय बोलियों का प्रयोग सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करता रहा है। वहीं उनका कहना है कि आधुनिक संचार माध्यमों और बदलती जीवनशैली के कारण नई पीढ़ी का अपनी पारंपरिक बोलियों से संपर्क कई क्षेत्रों में कमजोर हो रहा है। ऐसे समय में इनके साहित्यिक और संस्थागत संरक्षण की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है। यदि लोकसाहित्य का संकलन, प्रकाशन और दस्तावेजीकरण समय रहते किया जाए तो आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषाई विरासत से जोड़ना आसान होगा।
मौजूदा अकादमियों की तर्ज पर हो स्थापना
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए पहले से विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाएं संचालित कर रही है। मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद, आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी, साहित्य अकादमी, कालिदास संस्कृत अकादमी, सिंधी साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, मराठी साहित्य अकादमी, उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी, पंजाबी साहित्य अकादमी और भोजपुरी साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्रों में भाषा, साहित्य और संस्कृति से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ा रही हैं। इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए बघेली, बुंदेली और मालवी के लिए भी पृथक अकादमियों की स्थापना किए जाने की मांग की गई है।
उल्लेखनीय है कि इन संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय लेखकों और साहित्यकारों को मंच देने के साथ शोध, साहित्य प्रकाशन, शब्दकोश निर्माण, लोककथाओं के संकलन तथा नई पीढ़ी के बीच क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति रुचि विकसित करने के प्रयास किए जा सकते हैं। राम विश्वास कुशवाहा का कहना है कि क्षेत्रीय बोलियों का संरक्षण उनके दैनिक प्रयोग और साहित्यिक विकास, दोनों से जुड़ा विषय है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थाओं के स्तर पर इन भाषाओं से जुड़े कार्यक्रम बढ़ाए जा सकते हैं। लोक साहित्य के वरिष्ठ रचनाकारों और कलाकारों के अनुभवों को भी दस्तावेज के रूप में सुरक्षित किया जाना आवश्यक है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी