शारीरिक सुख नहीं, आत्म कल्याण को दें प्राथमिकता : प्रत्यक्षरत्न विजयजी

 


मंदसौर, 2 सितंबर (हि.स.)। जैन धर्म मनुष्य को भौतिक सुख-सुविधाओं में लिप्त होने के बजाय आत्म जागृति और आत्म कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जीवन में सुख और वैभव उपलब्ध होने के बावजूद जैन तीर्थंकरों तथा शालिभद्रजी ने आत्म कल्याण के लिए संयम का मार्ग अपनाया। हमें भी शारीरिक सुख को सर्वोच्च मानने के बजाय आत्मा के कल्याण के लिए चिंतन और प्रयास करना चाहिए।

यह विचार प. पू. जैन संत मुनिराज श्री प्रत्यक्षरत्न विजयजी म.सा. ने बुधवार को मंदसौर के जीवागंज स्थित राजेन्द्र विहार में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म सुविधा भोगी बनने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि आत्म जागृति के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि थोड़े से दुख या वेदना के आने पर कहीं वह विचलित तो नहीं हो जाता।

मुनिराज ने कहा कि जीवन में जब भी दुख अथवा वेदना का सामना करना पड़े, उससे घबराने के बजाय आत्म जागृति की दिशा में प्रयास करना चाहिए। हमारा मन स्वभाव से चंचल है, इसलिए उसे नियंत्रित करने का निरंतर प्रयास आवश्यक है। मन पर नियंत्रण और आत्म चिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है। धर्मसभा में मुनि श्री पवित्र रत्नजी म.सा. ने भी अपने विचार व्यक्त किए। धर्मसभा के समापन के बाद शोभाग्यमलजी संघवी परिवार की ओर से प्रभावना वितरित की गई।

मालवा महासंघ के पदाधिकारियों ने किए दर्शन-वंदन

इधर, मालवा महासंघ के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने जनकूपुरा स्थित उपाश्रय में पहुंचकर पूज्य मुनिराज श्री प्रत्यक्षरत्न विजयजी महाराज साहेब एवं मुनि श्री पवित्र रत्न विजयजी महाराज साहेब के दर्शन-वंदन किए और धार्मिक चर्चा की।

हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया