अनूपपुर: ब्रह्मलीन जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की 102वीं प्रकट उत्सव पर शत-शत नमन
अनूपपुर, 14 सितंबर (हि.स.)। सनातन धर्म, संस्कृति और बआध्यात्मिक चेतना के महान संवाहक, नित्य प्रातः स्मरणीय परम पूज्य अनंत श्री विभूषित ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की 102वीं जन्मजयंती पर देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ उन्हें शत-शत नमन किया जा रहा है। पूज्य गुरुदेव के जन्मदिवस पर उनके शिष्यों, गुरु भाइयों-बहनों एवं अनुयायियों ने उन्हें स्मरण करते हुए उनके विराट व्यक्तित्व और राष्ट्र, धर्म तथा समाज के प्रति किए गए अतुलनीय योगदान को नमन किया।
सोमवार को परम धर्म सांसद श्रीधर शर्मा से बहुभाषी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से विषेश चर्चा के दौरान कहा कि ज्योतिष पीठाधीश्वर एवं द्वारका-शारदा पीठाधीश्वर के रूप में पूज्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने सनातन धर्म की परंपरा, आध्यात्मिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आदि शंकराचार्य जी की परंपरा के पश्चात दो-दो पीठों को सुशोभित करने वाले महान संत के रूप में उनका योगदान विशेष रूप से स्मरणीय हैं।
राम जन्मभूमि आंदोलन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
श्रीधर शर्मा ने कहा कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार के प्रयासों में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के संकल्प को लेकर उन्होंने लंबे समय तक आवाज बुलंद की और इस दिशा में विभिन्न प्रयासों को आगे बढ़ाया। आज अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का साकार स्वरूप दिखाई देता है तो उनके अथक प्रयासों और लंबे संघर्ष को भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित रहा जीवन
श्रीधर शर्मा ने कहा कि पूज्य गुरुदेव का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी सदैव दिखाई दी। विश्व कल्याण आश्रम के माध्यम से आदिवासी एवं वनवासी भाई-बहनों की सेवा, उनके जीवन में शिक्षा, संस्कार और सेवा की भावना का विस्तार उनके कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इसी प्रकार मां गंगा को राष्ट्र नदी का सम्मान दिलाने, भारतीय संस्कृति और धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों की रक्षा करने तथा भगवान श्रीराम द्वारा निर्मित रामसेतु के संरक्षण के लिए भी उन्होंने मुखर होकर समाज को जागृत किया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे पूज्य गुरुदेव
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन राष्ट्रभक्ति का भी अद्भुत उदाहरण रहा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में उन्होंने राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन किया। एक संत, धर्माचार्य और राष्ट्रभक्त के रूप में उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
श्रीविद्या साधना को घर-घर पहुंचाने का कार्य
श्रीधर शर्मा ने कहा कि पूज्य गुरुदेव ने मां भगवती श्रीविद्या की आराधना एवं साधना परंपरा को जनमानस तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन से अनेक साधकों को सनातन साधना-पद्धति से जुड़ने का अवसर मिला। उनके द्वारा दिए गए ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक मार्गदर्शन को उनके शिष्य आज भी अपने जीवन का आधार मानते हैं। गुरु भाई-बहनों का कहना है कि पूज्य गुरुदेव भले ही देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनकी साधना, उनके संस्कार और उनका आशीर्वाद आज भी हम सभी के बीच विद्यमान है। उनकी छत्रछाया में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करना प्रत्येक शिष्य के लिए परम सौभाग्य है। 102 वीं जन्मजयंती के अवसर पर गुरु भक्तों ने कहा कि पूज्य गुरुदेव का नाम और उनका कार्य अनंत है। सनातन धर्म, राष्ट्र सेवा, गौ-गंगा-राम और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके समर्पण को युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला