आंदोलन कर रहे मनरेगाकर्मियों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही सरकार

 


देवघर, 05 जून (हि.स.)। झारखंड के मनरेगा कर्मी अपनी लंबित मांगों को लेकर पिछले लगभग तीन महीनों से आंदोलनरत हैं। आंदोलनरत कर्मियों का कहना है कि आंदाेलन उनकी वर्षों से वास्तविक समस्याओं और पीड़ा की अभिव्यक्ति है। कर्मियों ने जारी बयान में कहा है कि पिछले दो दशकों से वे ग्रामीण विकास और मनरेगा योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। इसके बावजूद आज भी बड़ी संख्या में क्षेत्रीय स्तर पर कार्यरत मनरेगा कर्मी मात्र 12 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय पर पूर्णकालिक सेवाएं देने को विवश हैं, जबकि राज्य मनरेगा कोषांग में कार्यरत कर्मियों को ग्रेड-पे सहित अन्य सुविधाएं प्राप्त हैं। बयान में कहा गया है कि एक ही व्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों के बीच इस प्रकार की असमानता स्वाभाविक रूप से असंतोष और पीड़ा को जन्म देती है। कर्मियों ने सवाल उठाया कि वर्तमान समय में 12 हजार रुपये प्रतिमाह पर किसी परिवार का सम्मानजनक जीवन-यापन संभव नहीं है।

मनरेगा कर्मियों ने यह भी कहा कि वर्षों की सेवा के दौरान 156 कर्मियों का निधन हो चुका है, जिनके परिवार आज भी आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि मनरेगा कर्मी राज्य के विकास में सहभागी हैं तो उनके परिवारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है। कर्मियों ने आंदोलन की वर्तमान स्थिति के लिए केवल कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराए जाने पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना है कि अतीत में कई बार सरकार एवं कर्मचारी प्रतिनिधियों के बीच लिखित समझौते हुए, मांगों पर सहमति बनी और आश्वासन दिए गए, लेकिन उनका पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका। इसी कारण कर्मचारियों के बीच विश्वास का संकट उत्पन्न हुआ है।

हालांकि मनरेगा कर्मियों ने स्पष्ट किया कि वे टकराव नहीं, बल्कि संवाद और समाधान के पक्षधर हैं। उन्होंने झारखंड की ग्रामीण विकास मंत्री, विभागीय सचिव एवं आयुक्त से अपील की है कि वे आंदोलन को केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ देखें और कर्मचारी प्रतिनिधियों के साथ सार्थक एवं परिणामोन्मुखी वार्ता सुनिश्चित करें।

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हिन्दुस्थान समाचार / Anup Kumar Roy