झारखंड में तैयार होगा स्टेट एक्शन फ्रेमवर्क फॉर ड्राउनिंग प्रिवेंशन, डूबने की घटनाओं की होगी निगरानी
रांची, 19 अगस्त (हि.स.)। झारखंड में नदियों, तालाबों, झरनों, खानों के गड्ढों और पर्यटन स्थलों में डूबने से होने वाली अप्राकृतिक मौतों को लेकर एक गंभीर और स्थायी समाधान की दिशा में पहला राज्यस्तरीय कदम उठाया गया।
बुधवार को होटल चाणक्या बीएनआर में नेशनल हेल्थ मिशन झारखंड और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था सिनी की ओर से वैश्विक सहयोगियों जैसे आरएनएलआई के तकनीकी सहयोग से स्टेट लेवल कंसल्टेशन ऑन ड्राउनिंग प्रिवेंशन कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इस उच्चस्तरीय परामर्श सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य राज्य में डूबने की घटनाओं को रोकने के लिए तैयारी, जोखिम प्रबंधन और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना था।
कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन, वन एवं पर्यावरण, शिक्षा और पंचायती राज विभाग के प्रतिनिधियों के साथ-साथ यूनिसेफ, जेएसएलपीएस, पिरामल फाउंडेशन और सीआईएनआई सहित दर्जनों गैर-सरकारी और विकास संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
बैठक के दौरान राज्य में जल दुर्घटनाओं से निपटने के लिए एक विस्तृत रणनीति और 90-दिवसीय कार्य योजना (90-डे प्लान) तैयार करने पर सहमति जताई गई।
जोखिम वाले हॉटस्पॉट्स चिन्हित करने और जल स्रोतों को बैरियर लगाने पर जोर
समीक्षा के दौरान पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार मई से जुलाई 2025 के बीच राज्य में डूबने से 161 लोगों की जान गई है, जो प्रतिदिन औसतन दो मौतों को दर्शाता है। इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए विशेषज्ञों और अधिकारियों ने कहा कि दुर्घटना के बाद राहत कार्य चलाने से बेहतर है कि दुर्घटना होने ही न दी जाए। इसके लिए जोखिम वाले हॉटस्पॉट्स को चिन्हित करने, जल स्रोतों को बैरियर लगाकर सुरक्षित बनाने, प्राथमिक बचाव उपकरण तैनात करने और समुदाय को जागरूक करने की जरूरत है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने कहा कि डूबने से होने वाली मौतें पूरी तरह से रोकी जा सकती है। इसके लिए खास कर स्कूल और कॉलेज के छात्रों के बीच व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। उन्होंने उच्च जोखिम वाले स्नान घाटों और झरनों पर स्थायी सुरक्षा रस्सियां और बैरियर नेट लगाने का सुझाव दिया, ताकि डूबते व्यक्ति को सहारा मिल सके।
पर्यटन से जुड़ी पंचायतों को विशेष ट्रेनिंग देने की सख्त जरूरत : सचिव
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव अबु बकर सिद्दीकी ने पर्यावरणीय और नीतिगत दृष्टिकोण साझा करते हुए कहा कि झारखंड में ईको-टूरिज्म बढ़ रहा है, ऐसे में पर्यटन से जुड़ी पंचायतों को विशेष ट्रेनिंग देने की सख्त जरूरत है। वन, पर्यावरण और जल निकायों के संरक्षण के साथ-साथ आपदा प्रबंधन की भूमिका तय करना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि हर जगह पुलिस की तैनाती संभव नहीं है, इसलिए सामुदायिक भागीदारी और प्रत्येक विभाग की जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ प्रभात कुमार ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था 'ग्राउंड जीरो' से ही शुरू करनी होगी, क्योंकि दुर्घटना के बाद केवल अस्पताल पर निर्भर रहना बहुत देर हो जाने जैसा है। सम्मेलन में भारत सरकार, डब्ल्यूएचओ और ब्रिटेन की संस्था आरएनएलआई के विशेषज्ञों ने ऑनलाइन जुड़कर अपने तकनीकी अनुभव साझा किए।
इस अवसर पर एनएचएम की राज्य कार्यक्रम प्रबंधक अनिमा किस्कू सहित स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन और एनएचएम के अन्य वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित थे।
सम्मेलन के दौरान झारखंड स्टेट एक्शन फ्रेमवर्क फॉर ड्राउनिंग प्रिवेंशन' तैयार करने का प्रस्ताव पास किया गया। इसके तहत एक बहु-विभागीय कार्य समूह का गठन किया जाएगा, जो राज्यभर में डूबने की घटनाओं की निगरानी, मौसम आधारित तैयारी, सामुदायिक प्रशिक्षण और सुरक्षा बैरियर लगाने जैसे कार्यों को जमीन पर उतारेगा। कार्यशाला में सभी हितधारकों ने मिलकर एक एकीकृत एसओपी जारी करने और पूरे राज्य में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने का दृढ़ संकल्प लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / Vinod Pathak