आर्थिक विकास का आकलन बजट के आकार से नहीं, सामाजिक प्रभाव से हो : वित्त मंत्री
रांची, 11 सितंबर (हि.स.)। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद से अब तक झारखंड की आर्थिक यात्रा की समीक्षा जरूरी है। ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के साथ विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों की स्थिति और भविष्य की दिशा पर भी विचार होना चाहिए।
मंत्री शुक्रवार को प्रेस क्लब सभागार में सामाजिक-आर्थिक एवं संसदीय अध्ययन केंद्र की ओर से ‘झारखंड : समग्र विकास के लिए संसाधन’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में बोल रहे थे।
कार्यक्रम में झारखंड की आर्थिक यात्रा, प्राकृतिक संसाधन, राजस्व क्षमता, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इसी दौरान ‘झारखंड : संसाधन अभिवृद्धि की अनिवार्यता’ स्मारिका का विमोचन भी किया गया।
उन्होंने कहा कि राज्य का बजट शुरुआती वर्षों में करीब 6 हजार करोड़ रुपये के स्तर पर था, जो अब काफी बढ़ चुका है। हालांकि आर्थिक विकास का मूल्यांकन केवल बजट के आकार से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से किया जाना चाहिए. मानव विकास, शिक्षा और रोजगार को आर्थिक विकास की प्राथमिकताओं से जोड़ना होगा।
पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. महेश पोद्दार ने कहा कि झारखंड की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी खनिज संपदा है, लेकिन केवल खनन आधारित अर्थव्यवस्था से राज्य की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सकता। खनिजों का स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन, तकनीकी क्षमता का विकास, बाजार विस्तार और रोजगार सृजन जरूरी है।
उन्होंने डीएमएफ की राशि का प्राथमिकता के आधार पर उपयोग करने की जरूरत बताई। साथ ही बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लिए जाने वाले कर्ज के साथ उसकी वापसी की क्षमता सुनिश्चित करने पर जोर दिया। रेत समेत अन्य प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से राज्य की आय बढ़ाने की संभावनाओं का भी उन्होंने उल्लेख किया।
अर्थशास्त्री डॉ. हरिश्वर दयाल ने कहा कि वित्तीय हस्तांतरण से झारखंड को लाभ मिला है, लेकिन राज्य की प्रति व्यक्ति आय अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। उन्होंने शिक्षा को राज्य के विकास की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल करने की जरूरत बताई।
उन्होंने महिला सशक्तीकरण, वन आधारित अर्थव्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों की वित्तीय क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया। स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने के साथ स्थानीय स्तर पर कर और गैर-कर राजस्व बढ़ाने की जरूरत बताई। व्यावसायिक संपत्तियों के सही मूल्यांकन और राजस्व संग्रह की व्यवस्था को मजबूत करने को भी उन्होंने जरूरी बताया।
कार्यक्रम में विमोचित स्मारिका ‘झारखंड: संसाधन अभिवृद्धि की अनिवार्यता’ में करीब 25 प्रमुख व्यक्तियों के लेख शामिल हैं। इनमें खनिज संपदा, प्राकृतिक संसाधन, राजस्व, वित्तीय प्रबंधन, स्थानीय निकाय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा, मानव संसाधन, रोजगार और मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर विचार रखे गए हैं।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. कमल बोस ने किया। संस्था के सचिव अयोध्या नाथ मिश्रा ने विषय प्रवेश कराया और राज्य की अर्थव्यवस्था पर गुणात्मक बहस की शुरुआत की। कार्यक्रम में डॉ. एचपी नारायण, प्रो. डॉ. चंद्रकांत शुक्ला, प्रो. शिव शंकर प्रसाद, शिव शंकर उरांव, अरुण कुमार मिश्रा सहित अन्य मौजूद रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे