दसलक्षण महापर्व पर अभिषेक-शांतिधारा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

 




रामगढ़, 23 सितंबर (हि.स.)। दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन बुधवार को शहर के मेन रोड स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर और रांची रोड स्थित 1008 श्री पार्श्वनाथ जिनालय में उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धा और भक्ति भाव से आराधना की गई।

मुनिसंघ के सानिध्य में आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन के दौरान मंदिर परिसर भक्ति गीतों, मंत्रोच्चार और जयकारों से गूंजता रहा। प्रातःकाल दिगंबर जैन मंदिर परिसर में मुनिश्री 108 पुण्यानंद जी महाराज के मुखारविंद से मंगल शांतिधारा संपन्न हुई।

पंडित संदीप शास्त्री के निर्देशन में अभिषेक, शांतिधारा और पूजन सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं विधि-विधानपूर्वक संपन्न कराई गईं। श्रद्धालुओं ने भगवान का अभिषेक एवं पूजन कर उत्तम त्याग धर्म की आराधना की।

समाज के अध्यक्ष राजेंद्र चूड़ीवाल ने बताया कि पांडुशिला पर विराजमान आदिनाथ भगवान की प्राचीन प्रतिमा पर कलश से अभिषेक का पुण्यार्जन महिपाल, अशोक, सुनील एवं संजय सेठी परिवार ने किया। जबकि, शांतिधारा का पुण्यार्जन सुशील, सुनीता एवं श्रीयांश चूड़ीवाल परिवार को मिला। वहीं, चंद्रप्रभु भगवान की प्राचीन प्रतिमा पर कलश से अभिषेक का पुण्यार्जन मांगीलाल, मनोज, अशोक, अरुण, आयुष एवं पीयूष चूड़ीवाल परिवार ने किया। आदिनाथ भगवान की बड़ी प्रतिमा पर शांतिधारा का पुण्यार्जन जीवन मल, जंबू कुमार, अभिजीत और अमित पाटनी परिवार की ओर से किया गया।

वहीं 1008 श्री पार्श्वनाथ जिनालय, रांची रोड में भी दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन अभिषेक और शांतिधारा श्रद्धा-भक्ति के साथ संपन्न हुई। प्रथम अभिषेक और शांतिधारा का पुण्यार्जन हरखचंद, विवेक एवं विकास अजमेरा परिवार, रामगढ़ द्वारा किया गया। वहीं संध्या आरती का पुण्यार्जन संतोष देवी, दीपक, अभिनव, तनिष एवं उदित बड़जात्या परिवार, रांची रोड द्वारा किया गया।

मंगल प्रवचन में मुनिश्री 108 पुण्यानंद जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म का आध्यात्मिक महत्व समझाते हुए कहा कि त्याग केवल वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि राग-द्वेष, मोह, अहंकार और कषायों का त्याग करना है। मनुष्य जितना अपने भीतर के विकारों और आसक्तियों को छोड़ता है, उतना ही आत्मिक शांति और आत्मशुद्धि के निकट पहुंचता है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन की सच्ची सार्थकता संग्रह में नहीं, बल्कि त्याग में है। उत्तम त्याग धर्म मनुष्य को आवश्यकता से अधिक संग्रह से बचने, परोपकार की भावना रखने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के हित में योगदान देने की प्रेरणा देता है। मोह, अहंकार और कषायों का त्याग ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।

दसलक्षण महापर्व को लेकर रामगढ़ जैन समाज में लगातार धार्मिक उत्साह बना हुआ है। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो गई। महिला, पुरुष एवं युवा श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। जैन समाज के मीडिया प्रभारी श्रवण जैन ने बताया कि दसलक्षण महापर्व के प्रत्येक दिन श्रद्धालु परिवार पूरे उत्साह के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बन रहे हैं। पर्व के माध्यम से संयम, त्याग, आत्मचिंतन, सेवा और सदाचार की भावना को मजबूत करने का संदेश दिया जा रहा है। बच्चों और युवाओं की सहभागिता भी विशेष रूप से देखने को मिल रही है। समाजजनों ने कहा कि दसलक्षण महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और जीवन को संयम एवं सदाचार की दिशा में ले जाने का अवसर है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अमितेश प्रकाश