तिब्बती अध्ययन संस्थानों के साथ सहयोग से पीजी पाठ्यक्रम में शामिल होंगे व्यावसायिक प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और शोध कार्यक्रम

 


जम्मू, 12 जून (हि.स.)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 की आवश्यकताओं के अनुरूप पारंपरिक धार्मिक शिक्षा को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में जम्मू विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विभाग के शिक्षकों ने हाल ही में धर्मशाला स्थित लाइब्रेरी ऑफ तिब्बतन वर्क्स एंड आर्काइव्स के निदेशक गेशे ल्हाकदोर तथा नोरबुलिंगका संस्थान के प्रबंध निदेशक त्सेरिंग फुंतसोक के साथ उच्चस्तरीय रणनीतिक बैठक कर भविष्य की कार्ययोजना तैयार की। डॉ. विवेक शर्मा और डॉ. राजेश शर्मा के नेतृत्व में हुई इस बैठक का उद्देश्य बौद्ध अध्ययन के स्नातकोत्तर (पीजी) पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बनाते हुए व्यावसायिक शिक्षा, व्यावहारिक प्रशिक्षण, शोध सहयोग और छात्र-शिक्षक विनिमय कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना था।

बैठक के बाद डॉ. विवेक शर्मा ने कहा कि एनईपी-2020 केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित रहने के बजाय व्यावहारिक और कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देती है। उन्होंने कहा कि बौद्ध अध्ययन के विद्यार्थियों को अब केवल ग्रंथों का ज्ञान ही नहीं बल्कि अभिलेखागार प्रबंधन, प्रदर्शनी आयोजन, मौखिक परंपराओं के दस्तावेजीकरण और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी दक्ष बनाया जाएगा। डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि एलटीडब्ल्यूए और नोरबुलिंगका संस्थान के साथ सहयोग विद्यार्थियों को व्यवहारिक अनुभव प्रदान करेगा। इसके तहत क्रेडिट आधारित इंटर्नशिप, संयुक्त शोध परियोजनाएं और फैकल्टी एक्सचेंज कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे जिससे पीजी पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप एक आदर्श मॉडल बन सकेगा।

नई व्यवस्था के तहत पाठ्यक्रम में अभिलेखागार प्रबंधन, पांडुलिपियों के डिजिटल दस्तावेजीकरण तथा मठ एवं विरासत स्थलों के प्रशासन से संबंधित अनिवार्य प्रायोगिक विषय शामिल किए जाएंगे। साथ ही एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के माध्यम से विद्यार्थियों को एलटीडब्ल्यूए और नोरबुलिंगका संस्थान में फील्डवर्क और प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा। दोनों संस्थान विलुप्तप्राय तिब्बती बौद्ध ग्रंथों और कलाकृतियों के संरक्षण पर संयुक्त शोध, प्रकाशन और सम्मेलन भी आयोजित करेंगे। गेशे ल्हाकदोर ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि यह साझेदारी परंपरा और आधुनिकता के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं त्सेरिंग फुंतसोक ने कहा कि कला और मानविकी में व्यावसायिक शिक्षा विद्यार्थियों को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बौद्ध अध्ययन विभाग अब पांडुलिपि संरक्षण से लेकर सांस्कृतिक पर्यटन प्रबंधन तक के क्षेत्रों को पाठ्यक्रम में शामिल कर राष्ट्रीय स्तर पर एक नई मिसाल स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। डॉ. विवेक शर्मा और डॉ. राजेश शर्मा के नेतृत्व में पाठ्यक्रम समीक्षा समिति इन बदलावों को अंतिम रूप देगी और आगामी शैक्षणिक सत्र से विद्यार्थियों को नए व्यावसायिक ट्रैक का लाभ मिलेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा