लड़कियों को नचाना क्यों ज़रूरी है, ज़ायरा वसीम ने स्कूल कार्यक्रम को लेकर जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की आलोचना की
श्रीनगर, 17 अगस्त (हि.स.)। पूर्व अभिनेत्री ज़ायरा वसीम ने कश्मीर के एक स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह में जम्मू और कश्मीर वक्फ बोर्ड की भागीदारी पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि बोर्ड के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में छोटी बच्चियों को मंच पर प्रस्तुति देने के लिए क्यों मजबूर किया गया। 2016 में आमिर खान अभिनीत फिल्म दंगल से प्रसिद्धि पाने वाली और फिर 2017 में सीक्रेट सुपरस्टार में अभिनय करने वाली वसीम ने आज एक्स पर एक पोस्ट में बच्चों, विशेषकर लड़कियों के ऐसे सार्वजनिक समारोहों में भाग लेने का विरोध किया।
उन्होंने कहा कि कश्मीर के किसी स्कूल का एक वीडियो क्लिप मिला। वक्फ बोर्ड द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह पर मेरा एक सवाल है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री जिन्होंने 2019 में अभिनय से नाता तोड़ लिया था क्योंकि यह उनके धर्म और आस्था में बाधा डालता था। उन्होंने लिखा कि क्या वक्फ बोर्ड एक धार्मिक संस्था नहीं है जिसे मुस्लिम समुदाय की सेवा करने का दायित्व सौंपा गया है और आदर्श रूप से इस्लामी मूल्यों को बनाए रखते हुए ऐसा करना चाहिए।
25 वर्षीय अभिनेत्री ने कहा कि यह लगभग हास्यास्पद है कि धार्मिक और सांप्रदायिक उद्देश्यों के लिए स्थापित संस्था ने ऐसे आयोजन पर सवाल नहीं उठाया जिसमें बच्चों को कलाकार बना दिया गया। उन्होंने पूछा कि सार्वजनिक समारोहों में बच्चों, विशेषकर लड़कियों को शामिल करने का आम तरीका उन्हें बेतुके गानों पर नचाना क्यों है। हमारी संस्थाएं उन्हें सोचने, कुछ नया करने, सीखने, चर्चा करने, निर्माण करने या योगदान देने के लिए कुछ क्यों नहीं दे रही हैं।
उन्होंने कहा कि कश्मीर में ऐसे लोगों की एक उल्लेखनीय विरासत है जिन्होंने शिक्षा को मन को प्रबुद्ध करने, चरित्र निर्माण करने और लोगों को ज्ञान और आध्यात्मिकता से सुसज्जित करने का साधन समझा। उन्होंने आगे कहा
कि इसलिए यदि कोई संस्था जिसका अस्तित्व ही धार्मिक उद्देश्य से जुड़ा है तो आपको समुदायों को आध्यात्मिक, नैतिक और बौद्धिक रूप से मजबूत करने का गहरा कार्य सौंपा जाता है। पूर्व अभिनेत्री ने कहा कि उनके पोस्ट का विषय बच्चे नहीं बल्कि ऐसी संस्थाओं के बारे में है जो ऐसे आयोजन करती हैं और उन्हें सुगम बनाती हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चों को अक्सर स्कूलों और संस्थाओं द्वारा प्रस्तुत किसी भी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बाध्य किया जाता है। शायद यही असली त्रासदी है। सवाल यह है कि कोई संस्था किन कार्यक्रमों को सुगम बनाती है, उनका समर्थन करती है और उन्हें अपने बैनर तले रखती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुमन लता