इन्द्रिय संयम ही ब्रह्मानन्द का मार्ग-वेद मन्दिर योल में स्वामी राम स्वरूप जी का संदेश
कठुआ, 25 जून (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के पावन यज्ञानुष्ठान के 75वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने जिज्ञासुओं को अथर्ववेद काण्ड 20 सूक्त 126 के माध्यम से गहन आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
अपने प्रवचन में उन्होंने बताया कि परमेश्वर ने जीवात्मा को पाँच तत्त्वों से निर्मित यह शरीर प्रदान किया है जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ हाथ, पैर, मुख, गुदा और उपस्थ के साथ मन और बुद्धि शामिल हैं। ये सभी साधन जीव को वैदिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिए गए हैं लेकिन जब इन्हीं इन्द्रियों का उपयोग वेद-विरुद्ध कर्मों में होता है तो जीव पाप के मार्ग पर चल पड़ता है और ईश्वर के दण्ड का भागी बनता है। उन्होंने आगे समझाया कि सामान्यतः इन्द्रियाँ प्रकृति के आकर्षण में फँसकर तत्वज्ञान से दूर हो जाती हैं और काम, क्रोध, मद, लोभ तथा अहंकार जैसे विकारों में उलझकर जीवात्मा को जन्म-जन्मांतर के दुःखों में डाल देती हैं।
स्वामी जी ने अथर्ववेद के मंत्र “यत्र वृषाकपिः” का उल्लेख करते हु कहा कि केवल वही साधक सच्चे आनन्द को प्राप्त करता है जो अपनी वासनाओं पर विजय प्राप्त कर इन्द्रियों को संयमित रखता है। “वृषाकपिः” अर्थात इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाला साधक ही परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जो मनुष्य विषय-विकारों में फँस जाता है वह न केवल रोगों का शिकार होता है बल्कि अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। अतः जीवन में आत्मसंयम और इन्द्रिय-निग्रह को अपनाकर ही स्थायी सुख और ब्रह्मानन्द की प्राप्ति संभव है। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस दिव्य ज्ञान को आत्मसात करते हुए संयमित और धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया