जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और आध्यात्मिक अवस्थाओं का किया विस्तृत विवेचन, आत्मा की शुद्ध अवस्था को बताया जीवन का अंतिम लक्ष्य

 


जम्मू, 12 जुलाई (हि.स.)। जम्मू के राँजड़ी में आयोजित सत्संग के दौरान साहिब बंदगी के सद्गुरु श्री मधुपरमहंस जी महाराज ने संगत को संबोधित करते हुए कहा कि मानव जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान आत्मज्ञान है और इसके बिना मनुष्य अज्ञान के बंधन में ही जीवन व्यतीत करता है। उन्होंने कहा कि यह संसार भ्रम और मोह से भरा हुआ है तथा आत्मा पंचभौतिक शरीर सहित विभिन्न अवस्थाओं में बंधी रहती है।

अपने प्रवचन में उन्होंने जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति (नींद), महाकारण, समाधि, कैवल्य, तुरीया और तुरीयातीत जैसी आध्यात्मिक अवस्थाओं का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य केवल स्थूल शरीर तक सीमित नहीं है बल्कि सूक्ष्म और अन्य चेतनात्मक अवस्थाओं से भी जुड़ा हुआ है। नींद को अज्ञान की अवस्था बताते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इसी अवस्था में व्यतीत करता है और इस दौरान भी सुख-दुख का अनुभव करता है।

सद्गुरु ने कहा कि योग और साधना के माध्यम से मन तथा श्वास पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है जिससे चेतना का विकास होता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना की विभिन्न अवस्थाओं में अनेक अनुभूतियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं लेकिन इनसे आगे बढ़कर आत्मा की शुद्ध अवस्था तक पहुँचना ही वास्तविक लक्ष्य है।

उन्होंने कहा कि संतों की अवस्था सभी मानसिक और आध्यात्मिक अवस्थाओं से परे होती है। वहीं आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है और वही वास्तविक मुक्ति तथा परम सत्य का अनुभव है। सत्संग के अंत में संगत ने सद्गुरु के आध्यात्मिक संदेशों को श्रद्धापूर्वक सुना और आत्मचिंतन तथा आध्यात्मिक साधना के महत्व को अपनाने का संकल्प लिया।

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा