निर्वासन में तिब्बती बौद्ध संस्कृति का संरक्षण विश्व के लिए प्रेरणा : वक्ता

 


जम्मू, 08 अक्टूबर (हि.स.)। बौद्ध संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को लेकर बौद्ध अध्ययन विभाग ने भारत तिब्बत सहयोग मंच (बीटीएसएम) के सहयोग से ‘निर्वासन में तिब्बती बौद्ध संस्कृति का संरक्षण : संकटग्रस्त वैश्विक संस्कृतियों के लिए प्रेरक उदाहरण’ विषय पर अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया। कार्यक्रम में तिब्बती समुदाय द्वारा निर्वासन के बावजूद अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई और दार्शनिक विरासत को संरक्षित रखने के प्रयासों पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम की शुरुआत वंदनीय विचित्तसारा और बौद्ध अध्ययन विभाग के विद्यार्थियों द्वारा बुद्ध वंदना से हुई। विभाग के प्रभारी प्रमुख डॉ. राजेश शर्मा ने स्वागत भाषण दिया, जबकि श्रीलंका के शोधार्थी अरुणा थरंगा ने अतिथि वक्ता का परिचय करवाया। मुख्य वक्ता और बीटीएसएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सेवानिवृत्त मेजर जनरल शिव कुमार शर्मा ने कहा कि निर्वासन में तिब्बती बौद्ध संस्कृति का संरक्षण सांस्कृतिक दृढ़ता का उल्लेखनीय उदाहरण है। उन्होंने कहा कि तिब्बती संस्कृति बौद्ध दर्शन के साथ-साथ भाषा, साहित्य, मठ शिक्षा, ध्यान, परंपरागत ज्ञान, कला, वास्तुकला और सामुदायिक प्रथाओं से जुड़ी व्यापक विरासत है।

उन्होंने कहा कि विस्थापन और मातृभूमि से भौगोलिक दूरी के बावजूद शिक्षा, धार्मिक संस्थानों, सामुदायिक भागीदारी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान के हस्तांतरण ने तिब्बती समुदाय को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने में मदद की। उन्होंने तिब्बती मठों, विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों और विद्वानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। वक्ताओं ने कहा कि वैश्वीकरण, पलायन, आधुनिकीकरण और भाषाई क्षरण से दुनिया की कई पारंपरिक संस्कृतियां प्रभावित हो रही हैं ऐसे में तिब्बती अनुभव से सीख ली जा सकती है। साथ ही डोगरा भाषा, संस्कृति और विरासत को भी भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए दस्तावेजीकरण और संरक्षण के प्रयासों पर जोर दिया गया।

डॉ. राजेश शर्मा ने कहा कि तिब्बती बौद्ध धर्म को केवल धार्मिक परंपरा के रूप में नहीं बल्कि दर्शन, साहित्य, कला, नैतिक मूल्यों और पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी व्यापक सांस्कृतिक व्यवस्था के रूप में समझने की जरूरत है। उन्होंने विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों से संकटग्रस्त सांस्कृतिक परंपराओं पर शोध, दस्तावेजीकरण, डिजिटल संरक्षण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का आह्वान किया। बीटीएसएम के जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख प्रदेश अध्यक्ष डॉ. विवेक शर्मा ने तिब्बती संस्कृति के संरक्षण को दृढ़ संकल्प और सांस्कृतिक चेतना का उदाहरण बताया तथा डोगरा विरासत के संरक्षण के लिए भी सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता जताई।

कार्यक्रम का संचालन पीएचडी शोधार्थी गिन्नी शर्मा और रुचिका शर्मा ने किया। इस अवसर पर डोगरी विभाग के डॉ. पदम सिंह और डॉ. संदीप दुबे, डॉ. एकता कुमारी, डॉ. नीरू चौधरी, शोधार्थी, विद्यार्थी और कार्यालय कर्मचारी उपस्थित रहे

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल शर्मा