कठुआ की बनी पहाड़ियों में ऑर्गेनिक अखरोट की कटाई शुरू

 


कठुआ, 30 अगस्त (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर के बनी के पहाड़ी इलाकों में अभी अखरोट तोड़ने का मौसम चल रहा है। किसान और उनके परिवार अपने बागों में पेड़ों से पके हुए अखरोट इकट्ठा करने में व्यस्त हैं। पारंपरिक तरीकों से उगाए गए इन अखरोटों को किसान प्राकृतिक खेती का उत्पाद मानते हैं।

बनी के किसानों ने बताया कि तोड़ने के बाद अखरोटों को साफ किया जाता है और बाजार में बेचने के लिए भेजने से पहले लगभग 5 से 6 दिनों तक धूप में सुखाया जाता है। उन्होंने कहा कि स्थानीय किसानों के लिए यह सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि साल भर की कड़ी मेहनत का नतीजा और आय का एक अहम जरिया है।

किसान मदन लाल ने बताया कि वह लगभग 30 वर्षों से बागवानी के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उनके पास अखरोट के लगभग 100 पेड़ हैं जिनमें मुख्य रूप से हमदान और सुलेमान किस्में शामिल हैं। वह हर साल अखरोट का उत्पादन करते हैं और कभी-कभी उनकी कुल पैदावार 50,000 अखरोट तक पहुँच जाती है। मदन लाल के अनुसार अखरोट की खेती लंबे समय से उनके लिए आय का एक अहम जरिया रही है। उन्होंने कहा कि जब भी प्रधानमंत्री मोदी किसानों और बागवानी के बारे में बात करते हैं तो उन्हें बहुत प्रेरणा मिलती है। 'मन की बात' कार्यक्रम के ज़रिए किसानों और बागवानी के बारे में प्रधानमंत्री की बातों ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया है। एक अन्य किसान, आदिल ने बताया कि वह साल भर अखरोट की फसल का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

उन्होंने कहा कि वे उस समय का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं जब पेड़ों पर अखरोट पक जाते हैं और उनकी तुड़ाई शुरू हो सकती है। आदिल ने बताया कि अखरोट तोड़ने के बाद उन्हें अच्छी तरह से साफ़ किया जाता है। फिर बाज़ार में बेचने के लिए भेजने से पहले उन्हें लगभग पाँच से छह दिनों तक धूप में सुखाया जाता है। उन्हें अखरोट की खेती करने में बहुत खुशी मिलती है और उन्हें बहुत गर्व और संतुष्टि महसूस होती है खासकर जब वे पेड़ों के नीचे खड़े होकर अपनी फ़सल को देखते हैं।

आदिल ने कहा कि उनके लिए यह सिर्फ़ एक फ़सल नहीं बल्कि साल भर की कड़ी मेहनत का फल और ज़मीन के साथ उनके गहरे जुड़ाव की निशानी है। हालाँकि ज़िला बागवानी अधिकारी ने बताया कि कठुआ के बानी इलाके में लगभग 3,000 परिवार अखरोट उत्पादन में लगे हुए हैं और उनकी आजीविका काफ़ी हद तक इसी खेती पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि जहाँ बाज़ार में एक अखरोट लगभग 3 रुपए में बिकता है वहीं एक पौधे को बड़ा होने और फल देने लायक बनने में काफ़ी समय लगता है।

मोहम्मद शकील ने कहा कि जब कोई पेड़ पूरी तरह से फल देने लगता है तो उससे हर सीज़न में लगभग 15,000 से 20,000 की कमाई हो सकती है। उन्होंने इस इलाके में अखरोट की खेती की अपार संभावनाओं पर भी ज़ोर दिया और बताया कि बागवानी विभाग किसानों को प्रोत्साहित करने और इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है। शकील ने यह भी बताया कि पिछले दो सालों से विभाग 'चैंडलर' अखरोट की किस्म पर काम कर रहा है और उन्होंने चैंडलर को बेहतरीन क्वालिटी वाली किस्म बताया जिसमें भविष्य में इलाके के किसानों के लिए बहुत संभावनाएँ हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / राधा पंडिता