काम-क्रोध मनुष्य के प्रबल शत्रु, योग और यज्ञ से ही संभव है आत्मसंयम-स्वामी राम स्वरूप जी

 


कठुआ, 08 जून (हि.स.)। वेद मन्दिर योल में आयोजित 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 58वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को अथर्ववेद मन्त्र 7/77/1,2 के आधार पर जीवनोपयोगी उपदेश दिए।

उन्होंने कहा कि काम और क्रोध मनुष्य के सबसे प्रबल शत्रु हैं जो बार-बार इनके प्रभाव में आने से और अधिक बढ़ते जाते हैं तथा अंततः जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं। वेदों में इनकी तुलना कुत्तों के भौंकने और भेड़ियों द्वारा बछड़ों को उठाकर ले जाने से की गई है जिसका भाव है कि ये दोष मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देते हैं और उसे मानसिक रूप से पीड़ित करते हैं।

स्वामी जी ने बताया कि इन विकारों पर नियंत्रण के लिए नियमित योगाभ्यास, आसन और प्राणायाम अत्यंत आवश्यक हैं। इनके अभ्यास से काम, क्रोध, मद, लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं का नाश होता है और जीवन में शांति व संतुलन स्थापित होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति क्रोधित होकर हमारी शांति भंग करने का प्रयास करता है, तब योगाभ्यास, नाम-जाप और तपस्या के माध्यम से उसके प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। ईश्वर सदैव धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की रक्षा करता है। स्वामी राम स्वरूप जी ने यज्ञ और अग्निहोत्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेदानुसार यज्ञ-अग्निहोत्र से इन्द्रियों पर संयम आता है, शरीर निरोग रहता है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है।

अंत में उन्होंने कहा कि नित्य योगाभ्यास, यज्ञ और वेदाध्ययन ही ऐसा मार्ग है जो मनुष्य के पापों का नाश कर उसे दीर्घायु, सुखमय जीवन प्रदान करता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया