भरोसे की शिकारा यात्रा-डल झील से उठी इंसानियत की सबसे सच्ची तस्वीर

 


श्रीनगर, 07 अगस्त (हि.स.)। डल झील की शांत लहरों पर तैरती एक साधारण सी शिकारा यात्रा ने इंसानियत, भरोसे और अपनत्व की ऐसी कहानी लिख दी जो आज के दौर में उम्मीद की किरण बनकर उभरती है।

श्रीनगर प्रवास के दौरान जब हम डल झील में शिकारा सवारी कर रहे थे तो हमारे शिकारा चालक अयान ने मुस्कुराते हुए पूछा सर खरीदारी करनी है, भीड़-भाड़ में घूमना है या शांत जगह देखनी है हमने बिना झिझक जवाब दिया कि हमें केवल डल झील का वास्तविक सौंदर्य देखना है।

अयान ने शिकारा को भीड़ से दूर संकरी जल-गलियों की ओर मोड़ दिया। कुछ ही देर में शोर-शराबा पीछे छूट गया और चारों ओर सुकून भरा वातावरण फैल गया। इसी बीच उसने सहज भाव से पूछा “सर मेरे घर चलेंगे” यह प्रस्ताव अचानक था लेकिन हमने हामी भर दी। हालांकि मन में हल्का संकोच भी था। हाल ही में क्षेत्र में हुई एक दुखद घटना जहां बाहरी मजदूरों की आतंकियों द्वारा हत्या कर दी गई थी ने स्वाभाविक रूप से चिंता बढ़ा दी थी। मेरी बेटी ने भी धीरे से पूछा “पापा कहीं कोई खतरा तो नहीं” लेकिन हमने भरोसा किया और अयान के साथ आगे बढ़े।

थोड़ी दूर चलने के बाद पानी के बीचों-बीच एक सुंदर लकड़ी का तीन मंजिला घर दिखाई दिया। यही अयान का घर था। वहां पहुंचते ही उसकी मां, मासी, बड़ी बहन और अन्य परिवारजन ने जिस आत्मीयता से स्वागत किया वह अविस्मरणीय था। घर के हर हिस्से को उन्होंने गर्व और स्नेह के साथ दिखाया। कहवा, चाय और नाश्ते का बार-बार आग्रह किया गया। विनम्रता से मना करने के बावजूद अयान की मां ने स्नेहपूर्वक ड्राई फ्रूट और स्थानीय फल हमारे हाथों में रख दिए। घर के आसपास सेब, नाशपाती, अनार और सब्जियों की खेती थी। ऊपर के कमरे में कद्दू और पालक को सुखाया जा रहा था जो कश्मीर की सर्दियों की तैयारी का हिस्सा है।

जब विदा का समय आया तो अयान की मां और मासी के शब्द दिल को छू गए “हमें बहुत अच्छा लगा आपने हम पर भरोसा जताया। यह सिर्फ धन्यवाद नहीं था बल्कि वर्षों से चले आ रहे अविश्वास और पीड़ा की एक गहरी अभिव्यक्ति थी। इन शब्दों में यह उम्मीद भी छिपी थी कि भरोसा फिर से सामान्य बन सके। इस पूरे अनुभव का सबसे भावुक क्षण तब आया जब हमने शिकारे का किराया अधिक देने की कोशिश की। अयान ने मुस्कुराते हुए पैसे वापस करते हुए कहा कि नहीं सर आप मेरे मेहमान हैं। आपने हमारे घर आकर हमें सम्मान दिया यही सबसे बड़ी बात है।

यह घटना बताती है कि कश्मीर की असली पहचान केवल प्राकृतिक सुंदरता नहीं बल्कि वहां के लोगों की सादगी, आत्मीयता और दिल से जुड़े रिश्ते हैं। आज जब समाज में अविश्वास की खाई गहराती नजर आती है ऐसे अनुभव यह संदेश देते हैं कि भरोसा दोनों ओर से बनता है। यदि अपनत्व और सद्भाव की भावना मजबूत हो तो वह दिन दूर नहीं जब “भरोसा जताने के लिए धन्यवाद” जैसे शब्द असामान्य नहीं बल्कि सामान्य हो जाएंगे।

इस यात्रा ने यह साबित कर दिया कि इंसानियत, सम्मान और विश्वास यही भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं।

(लेखक-श्रीराम जायसवाल)

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया