वेदों की ओर लौटने का आह्वान-योल के वेद मंदिर में यज्ञानुष्ठान का 35वां दिन
कठुआ, 16 मई (हि.स.)। वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 35वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने ऋग्वेद मंत्र 10/27/9 की व्याख्या करते हुए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
उन्होंने बताया कि परमात्मा कण-कण में व्याप्त होने के साथ मानव हृदय में विशेष रूप से विराजमान है। “अयुक्तं युनजत्” का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि चंचल मन को योगाभ्यास, उपासना और वेदसम्मत शुभ कर्मों में लगाना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। योग शास्त्र के सूत्रों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने बताया कि चित्त की वृत्तियों को योग और वैराग्य के माध्यम से नियंत्रित कर ही प्रभु प्राप्ति संभव है। उन्होंने कहा कि निरंतर, श्रद्धा और दृढ़ता के साथ किया गया योगाभ्यास जीवनभर साधक को आनंद प्रदान करता है। भगवद्गीता के श्लोकों का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वैदिक कर्म और योग साधना का फल कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि जन्म-जन्मांतर तक साधक के साथ रहता है। अंत में उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वेदों को पुनः जीवन में अपनाकर, शुभ कर्मों के मार्ग पर चलें और मोक्ष की प्राप्ति करें।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया