लोकमान्य तिलक के राष्ट्रवादी विचारों पर शिमला में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

 


शिमला, 28 जुलाई (हि.स.)। शिमला के राष्ट्रपति निवास स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस) में मंगलवार से राष्ट्रीय एकीकरण में तिलक की भूमिका विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस संगोष्ठी में देश और विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विद्वानों की भागीदारी है। संगोष्ठी का उद्देश्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी चिंतन, स्वराज, स्वदेशी, कर्मयोग, सांस्कृतिक दृष्टि और राष्ट्रीय एकात्मता से जुड़े विचारों पर समकालीन संदर्भ में चर्चा करना है।

संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि संस्थान भारतीय बौद्धिक परंपराओं से जुड़े अकादमिक विमर्शों को लगातार प्रोत्साहित करता है। उन्होंने कहा कि तिलक केवल स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता नहीं थे, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, आत्मगौरव और राष्ट्रीय एकता के सशक्त प्रवक्ता भी थे।

संगोष्ठी के संयोजक और संस्थान के राष्ट्रीय फेलो प्रो. आर.सी. सिन्हा ने कहा कि तिलक के योगदान को केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने गीता रहस्य के माध्यम से कर्मयोग की ऐसी व्याख्या की, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार दिया और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को जन-जागरण का माध्यम बनाया।

मुख्य वक्ता प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने कहा कि तिलक के लिए स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, बौद्धिक और नैतिक आत्मनिर्भरता का भी आधार था। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन और भगवद्गीता पर तिलक के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्थान की अध्यक्षा प्रो. शशि प्रभा कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय एकीकरण की नींव साझा सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता पर टिकी है।

संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है के उद्घोष ने भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाया। गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक आयोजनों को तिलक ने राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक एकता का माध्यम बनाया। उनके कर्मयोग, स्वदेशी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

उद्घाटन सत्र के बाद तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें लीबिया से आए प्रो. अनिल कुमार प्रसाद, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डी.एन. तिवारी, सिक्किम विश्वविद्यालय की प्रो. वीणु पंत, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रो. द्वारिका नाथ, आईआईएएस की टैगोर फेलो प्रो. उमा सी.टी. वैद्य और महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा के प्रो. रामनाथ पांडेय ने तिलक के राष्ट्रवादी चिंतन, गीता रहस्य, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकीकरण पर शोधपत्र प्रस्तुत किए। अगले दो दिनों में भी विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा