भगवान बुद्ध की करुणा, मध्यम मार्ग, अहिंसा और प्रज्ञा की शिक्षाएं अधिक प्रासंगिक : राज्यपाल

 




धर्मशाला, 05 जुलाई (हि.स.)। राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने कहा है कि वर्तमान समय में जब संपूर्ण विश्व हिंसा, असहिष्णुता, युद्ध, पर्यावरणीय संकट और नैतिक मूल्यों के क्षरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे दौर में भगवान बुद्ध की करुणा, मध्यम मार्ग, अहिंसा और प्रज्ञा की शिक्षाएं पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठी हैं। राज्यपाल ने धम्मपद के शाश्वत संदेश का उदहारण देते हुए कहा कि बैर से बैर कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि प्रेम और करुणा से ही उसका अंत संभव है और यही सनातन नियम है।

राज्यपाल ने रविवार को बैजनाथ के टाशिजोंग में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन 'नालंदा से हिमालय तक-बौद्ध ज्ञान परंपरा की अक्षुण्ण विरासत' विषय पर बतौर मुख्य अतिथि यह बातें कही। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए ज्ञान का आलोक-स्तंभ था, जहां दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, व्याकरण, गणित और खगोल विज्ञान जैसे विषयों पर उच्च कोटि का अनुसंधान होता था। यद्यपि समय के साथ नालंदा का भौतिक स्वरूप नष्ट हो गया, लेकिन हिमालय के मठों, विहारों और बौद्ध संस्थानों ने सदियों तक भारतीय भाषाओं, संस्कृति, कला और अमूल्य पांडुलिपियों को सहेजकर इस महान विरासत को जीवित रखा है। इस दृष्टि से भारतीय हिमालय वास्तव में नालंदा की जीवित विरासत का सच्चा संरक्षक है।

राज्यपाल ने परिषद् द्वारा मठों में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान के पाठ्यक्रम को लागू करने की अनूठी पहल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह कदम पारंपरिक मठ शिक्षा और आधुनिक औपचारिक शिक्षा के बीच एक सार्थक सेतु का कार्य करेगा, जिससे युवा भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ अपनी आध्यात्मिक साधना को अक्षुण्ण रखते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर सकेंगे।

परम पावन दलाई लामा के मार्गदर्शन में स्थापित इस परिषद् के पदाधिकारियों के प्रयासों की सराहना करते हुए राज्यपाल ने देश के युवाओं से नालंदा परंपरा के मूल आदर्शों—जिज्ञासा, तार्किक चिंतन, अनुशासन, करुणा और मानव सेवा से प्रेरणा लेने का आग्रह किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकसित भारत-2047 के संकल्प को सिद्ध करने के लिए आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ हमारी समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्यों को भी समान महत्व देना अनिवार्य है।

इस राष्ट्रीय सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में सीटीए धर्मशाला के धर्म और संस्कृति विभाग के मंत्री सेग्याल चुकया द्रन्यी, खम्पागर मठ के आध्यात्मिक प्रमुख एच.ई. खमतुल रिंपोछे, खेनपो चोयिंग लुंडुप, पालपुंग शेराबलिंग मठ से कहेनपो पेमा नेगी, बैजनाथ के विधायक किशोरी लाल सहित अन्य गणमान्य लोग भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया