आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन पर गहन मंथन, दूसरे दिन विशेषज्ञों ने रखे विचार
धर्मशाला, 05 अप्रैल (हि.स.)। हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने गहन चर्चा की। कार्यक्रम की शुरुआत केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति के उद्घाटन संबोधन से हुई, जिसमें उन्होंने आपदाओं की बदलती प्रकृति और उनके व्यापक प्रभावों पर प्रकाश डाला।
कुलपति ने कहा कि आपदा प्रबंधन को समझने के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने वैज्ञानिक शोध, नीतिगत निर्णय और प्रशासनिक ढांचे के बीच समन्वय पर जोर देते हुए आपदा जोखिम न्यूनीकरण में जागरूकता, तैयारी और सटीक निर्णयों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
इसके बाद मुख्य वक्ता प्रो. एम.जी. ठक्कर ने पृथ्वी तंत्र की लचीलापन क्षमता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि टेक्टोनिक प्रक्रियाएं और जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की संरचना को निरंतर प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं को समझने और उनसे निपटने के लिए अतीत के अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में डॉ. फिरोज ने उत्तराखंड क्षेत्र के पिछले 5000 वर्षों के जलवायु परिवर्तन का विश्लेषण प्रस्तुत किया, जो पराग जीवाश्मों के अध्ययन पर आधारित था। वहीं डॉ. आनंद शर्मा ने केदारनाथ आपदा का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करते हुए मौसमीय परिस्थितियों, प्रशासनिक चुनौतियों और राहत कार्यों में आई बाधाओं पर चर्चा की।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सुनीत द्विवेदी ने भारतीय मानसून वर्षा के पैटर्न का गणितीय मॉडलिंग के माध्यम से विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिससे जलवायु परिवर्तन की बेहतर समझ विकसित करने में मदद मिलती है।
दूसरे सत्र में डॉ. उपासना एस. बनर्जी ने पिछले 11 हजार वर्षों में आए अचानक जलवायु परिवर्तनों और उनके हिमालयी क्षेत्र पर प्रभावों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि हिमालय न केवल भारतीय मानसून बल्कि वैश्विक जलवायु प्रणाली को भी प्रभावित करता है।
शैलेन्द्र राय ने जलवायु परिवर्तन के कारण डेंगू जैसी बीमारियों के बढ़ते खतरे पर चिंता जताई और संभावित जोखिम वाले समय और क्षेत्रों की पहचान करने की आवश्यकता बताई।
राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण एजेंसी के डॉ. अरुण कुमार ने हिमाचल प्रदेश में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं पर प्रकाश डालते हुए प्रभावी प्रबंधन रणनीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अभिजीत द्विवेदी ने पर्यावरण कानून और न्यायिक निर्णयों पर चर्चा करते हुए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि मौजूदा नीतियों में सुधार कर आपदा जोखिम को कम किया जा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया