टांकरी लिपि के पुनरुत्थान हेतु कार्यशाला आयोजित, दो छात्रवृत्तियों की घोषणा

 


मंडी, 24 फ़रवरी (हि.स.)। नगर की 500 वर्षों की ऐतिहासिक विरासत के उपलक्ष्य में सरदार पटेल विश्वविद्यालय, मंडी के इतिहास विभाग एवं भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ द्वारा टांकरी लिपि : पुनरुत्थान एवं संरक्षण विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन मांडव परिसर में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलगुरु आचार्य ललित कुमार अवस्थी रहे। अध्यक्षता प्रो. पुष्प राज कपूर सेवानिवृत्त आचार्य, वल्लभ महाविद्यालय ने की। मुख्य वक्ता रूप में हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के सेवानिवृत सचिव डॉ. कर्म सिंह उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में इंटेक मंडी चैप्टर के सह-संयोजक अनिल शर्मा तथा अधिष्ठाता छात्र कल्याण आचार्य राजेश कुमार शर्मा सम्मिलित रहे।

कार्यक्रम का संयोजन इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा द्वारा किया गया और उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य की जानकारी दी जबकि मंच संचालन मनीषा ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ। राष्ट्रगीत के उपरांत डॉ. राम पाल ने औपचारिक स्वागत एवं अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि आचार्य ललित कुमार अवस्थी ने आभासी माध्यम से कहा कि टांकरी लिपि केवल लेखन पद्धति नहीं अपितु हिमालयी सांस्कृतिक चेतना की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है। उन्होंने इसके संरक्षण को विश्वविद्यालय की बौद्धिक जिम्मेदारी बताया। मुख्य वक्ता डॉ. कर्म सिंह ने टांकरी लिपि के ऐतिहासिक विकास, शिलालेखों, पांडुलिपियों तथा प्रशासनिक अभिलेखों में इसके प्रयोग का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने इसे पहाड़ी राज्यों की राजकीय एवं सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी लिपि बताया तथा शोधार्थियों से इसके व्यवस्थित अभिलेखीकरण और डिजिटलीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

विशिष्ट अतिथि आचार्य राजेश कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान परम्परा के संदर्भ में टांकरी लिपि के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि स्थानीय इतिहास के पुनर्लेखन में इस लिपि का अध्ययन अत्यंत सहायक सिद्ध होगा। पुष्प राज कपूर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में टांकरी लिपि को हिमालयी अंचल की सांस्कृतिक अस्मिता और ऐतिहासिक स्रोत-संपदा का मूलाधार बताते हुए कहा कि यदि इस लिपि का संरक्षण और संवर्धन सुनिश्चित नहीं किया गया, तो क्षेत्रीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय विलुप्त हो सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने प्रतिवर्ष दो छात्रवृत्तियाँ, प्रत्येक एक हजार रुपये प्रति माह की दर से प्रदान करने की घोषणा की। प्रो. कपूर ने स्पष्ट किया कि ये छात्रवृत्तियाँ विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए होंगी जो टांकरी लिपि के अध्ययन, पांडुलिपियों के पाठ-परिशोधन, अभिलेखों के अनुवाद, तथा स्थानीय इतिहास के पुनर्लेखन में सक्रिय रूप से संलग्न रहेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा