पर्यावरण संरक्षण हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा : प्रो. ललित कुमार अवस्थी

 


मंडी, 05 अगस्त (हि.स.)। सरदार पटेल विश्वविद्यालय, मंडी के इतिहास विभाग द्वारा भारत में पारिस्थितिकी और पर्यावरण का इतिहास विषय पर एक अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ललित कुमार अवस्थी रहे। जबकि मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. राज कुमार, समन्वयक एवं सहायक आचार्य, इतिहास विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र, खनियारा जिला कांगड़ा उपस्थित रहे। शुभारंभ अवसर पर इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता, संकाय सदस्यों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का हार्दिक स्वागत करते हुए कहा कि पर्यावरणीय इतिहास आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक अध्ययन क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में प्रकृति के प्रति सम्मान, संरक्षण तथा संतुलित उपयोग की समृद्ध परम्परा रही है, जिससे वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु महत्त्वपूर्ण प्रेरणा प्राप्त होती है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो. ललित कुमार अवस्थी ने ऑनलाइन माध्यम से अपने संबोधन में कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक या तकनीकी विषय नहीं है । बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है तथा जल, जंगल, भूमि और जैव विविधता के संरक्षण की भावना हमारी सभ्यता का अभिन्न अंग रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे इतिहास के अध्ययन के माध्यम से पर्यावरणीय चेतना को समझें तथा सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसे शैक्षणिक व्याख्यानों का अधिकाधिक लाभ उठाने और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक एवं उत्तरदायी नागरिक बनने का आह्वान किया।

मुख्य वक्ता डॉ. राज कुमार ने भारत में पारिस्थितिकी और पर्यावरण का इतिहास विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत में पर्यावरण संरक्षण की परम्परा वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक निरंतर विकसित होती रही है। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों, लोक परम्पराओं, पवित्र वनों, जल संरक्षण प्रणालियों तथा सामुदायिक संसाधन प्रबंधन की ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना को सदैव महत्व दिया है। उन्होंने औपनिवेशिक काल में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, वनों पर राज्य नियंत्रण तथा उसके सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों का विश्लेषण करते हुए चिपको आंदोलन, बिश्नोई समुदाय के योगदान तथा अन्य जन आंदोलनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के दौर में इतिहास का अध्ययन हमें अतीत के अनुभवों से सीख लेकर भविष्य के लिए अधिक संतुलित एवं सतत विकास की दिशा प्रदान करता है। उन्होंने विद्यार्थियों से पर्यावरणीय इतिहास के क्षेत्र में शोध की नई संभावनाओं पर कार्य करने का आह्वान किया तथा प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा