शिरगुल देवता मंदिर फागू में विधि-विधान से लगाई गई ‘मझेई’, अब ‘कुरूड़’ की तैयारी
नाहन, 11 अक्टूबर (हि.स.)। जिला सिरमौर के राजगढ़ क्षेत्र के फागू स्थित प्राचीन शिरगुल देवता मंदिर में रविवार को देव परंपराओं के अनुसार मंदिर की छत पर शहतीरी लगाने की पारंपरिक रस्म ‘मझेई’ विधि-विधान से संपन्न की गई।इस धार्मिक अनुष्ठान के पूरा होने के साथ ही मंदिर निर्माण कार्य ने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है। अब मंदिर निर्माण की अंतिम पारंपरिक रस्म ‘कुरूड़’ लगाने की तैयारी की जाएगी।शावगा क्षेत्र के शिरगुल देवता से जुड़ी इस धार्मिक परंपरा के निर्वहन के दौरान देवकार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मझेई के बाद कुरूड़ लगाने की रस्म मंदिर निर्माण की प्रक्रिया में विशेष महत्व रखती है। कुरूड़ स्थापित होने के बाद मंदिर की छत पर किसी भी व्यक्ति का जाना वर्जित हो जाता है। इस परंपरा का पालन देवता की धार्मिक मर्यादा और स्थानीय आस्था के अनुरूप किया जाता है।मंदिर परिसर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में मुख्य सलाहकार देवीराम शर्मा, मुख्य देवा पृथ्वीराज, शिरगुल देवकार्य के मुखिया निवेश ठाकुर, प्रमुख भाग सिंह पड़िया तथा पूर्व शिरगुल देवकार्य मुखिया रणवीर सिंह चौहान सहित क्षेत्र के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
सभी की मौजूदगी में देवपरंपरा के अनुसार मंदिर की छत पर शहतीरी लगाने की रस्म पूरी की गई। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अपनी पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के प्रति आस्था व्यक्त की।स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन केवल मंदिर निर्माण का हिस्सा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही देव संस्कृति और सामूहिक आस्था का प्रतीक भी है।
फागू स्थित इस प्राचीन मंदिर को स्थानीय मान्यताओं के अनुसार शिरगुल देवता के पिता भुखडू महाराज के समय का बताया जाता है। मंदिर क्षेत्र के लोगों की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहां सदियों पुरानी देव परंपराओं और रीति-रिवाजों का निर्वहन श्रद्धापूर्वक किया जाता रहा है।मंदिर के निर्माण और उससे जुड़ी धार्मिक रस्मों को भी इन्हीं परंपराओं के अनुरूप आगे बढ़ाया जा रहा है। मझेई लगाने के बाद अब श्रद्धालुओं की निगाहें मंदिर निर्माण की अंतिम महत्वपूर्ण रस्म कुरूड़ पर टिकी हैं।
फागू मंदिर की विशेष पहचान यहां मौजूद प्राचीन स्थापत्य शैली से जुड़े अवशेष भी हैं। स्थानीय मान्यताओं में इन अवशेषों को महाभारत काल में पांडवों के वनवास के समय की स्थापत्य परंपरा से जोड़ा जाता है। इसी तरह की पारंपरिक स्थापत्य शैली क्षेत्र के बलग और हाटकोटी स्थित मंदिरों में भी देखने को मिलती है। हालांकि, फागू मंदिर के अवशेषों की वास्तविक प्राचीनता और ऐतिहासिक काल का निर्धारण पुरातात्विक अध्ययन के बाद ही किया जा सकता है। इसके बावजूद मंदिर से जुड़ी लोकमान्यताएं और पारंपरिक स्थापत्य क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
इस धार्मिक आयोजन ने क्षेत्र की प्राचीन देवपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर रेखांकित किया है। स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए मंदिर निर्माण अपनी आस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ पूर्वजों से चली आ रही परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / जितेंद्र ठाकुर