हिमाचल में 20 सरकारी स्कूल बंद, 73 का विलय, भाजपा ने सरकार पर साधा निशाना

 


शिमला, 11 जून (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश सरकार ने ऐसे विद्यालयों को बंद करने और उनका पुनर्गठन करने का फैसला लिया है, जहां या तो एक भी छात्र नामांकित नहीं था या फिर विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम रह गई थी। शिक्षा विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार प्रदेश में 20 सरकारी विद्यालयों को बंद किया गया है, जबकि 73 विद्यालयों का अन्य स्कूलों में विलय कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। वहीं, विपक्षी दल भाजपा ने इसे सरकार का शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम बताया है।

शिक्षा सचिव राकेश कंवर द्वारा जारी आदेशों के अनुसार जिन विद्यालयों में एक भी छात्र नामांकित नहीं था, उन्हें डिनोटिफाई कर तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया गया है। बंद किए गए विद्यालयों में 18 सरकारी प्राथमिक विद्यालय और दो सरकारी माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं। ये विद्यालय बिलासपुर, चंबा, कुल्लू, मंडी और शिमला जिलों में स्थित हैं। सबसे अधिक 11 विद्यालय शिमला जिले में बंद किए गए हैं, जबकि मंडी जिले के पांच विद्यालयों पर ताला लगा है। चंबा जिले में दो तथा बिलासपुर और कुल्लू में एक-एक विद्यालय बंद किया गया है। सरकार का कहना है कि बिना छात्रों वाले विद्यालयों को संचालित करने में संसाधनों का उपयोग हो रहा था, लेकिन उनका शैक्षणिक लाभ नहीं मिल पा रहा था।

इसके साथ ही सरकार ने उन विद्यालयों के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, जहां विद्यार्थियों की संख्या पांच या उससे कम रह गई थी। ऐसे कुल 73 विद्यालयों का आसपास के स्कूलों में विलय किया गया है। इनमें 65 सरकारी प्राथमिक विद्यालय और आठ सरकारी माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं। इन स्कूलों को निकटवर्ती सरकारी प्राथमिक, केंद्रीय प्राथमिक, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में समायोजित किया गया है।

विलय किए गए विद्यालयों में सबसे अधिक 18 प्राथमिक विद्यालय मंडी जिले से हैं, जबकि शिमला जिले के 13 प्राथमिक विद्यालयों का विलय किया गया है।

इस फैसले को लेकर विपक्षी भाजपा ने सरकार पर हमला बोला है। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष और विधायक विनोद कुमार ने कहा कि कांग्रेस सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करने की दिशा में काम कर रही है। उनका आरोप है कि सरकार अपने कार्यकाल में अब तक 2000 से अधिक शैक्षणिक और अन्य जनहित संस्थानों को बंद कर चुकी है, जिससे प्रदेश के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

विनोद कुमार ने कहा कि सरकार छात्र संख्या कम होने का तर्क दे रही है, लेकिन यदि विद्यालयों में छात्रों की संख्या घटी है तो इसके लिए सरकार की शिक्षा नीतियां भी जिम्मेदार हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार शिक्षा के स्तर को सुधारने, शिक्षकों की नियुक्तियां करने और सुविधाएं बढ़ाने के बजाय संस्थानों को बंद करने का रास्ता अपना रही है। उनके अनुसार इस निर्णय का सबसे अधिक असर ग्रामीण, दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों के विद्यार्थियों पर पड़ेगा, क्योंकि अब कई बच्चों को पढ़ाई के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा