रिश्तेदारी में भी अब सीधे नहीं ले सकेंगे बच्चा गोद, पहले कराना होगा पंजीकरण

 

शिमला, 16 जुलाई (हि.स.)। परिवार या रिश्तेदारी में किसी बच्चे को गोद लेने की पुरानी परंपरा अब केवल आपसी सहमति से पूरी नहीं हो सकेगी। हिमाचल प्रदेश में अब रिश्तेदारों के बीच होने वाले दत्तक ग्रहण और सौतेले माता-पिता द्वारा बच्चे को गोद लेने के मामलों में भी केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) के माध्यम से पंजीकरण और कानूनी प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य होगा।

जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही जिला दंडाधिकारी की ओर से दत्तक ग्रहण प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। इसके बाद ही बच्चे को कानूनी रूप से दत्तक माता-पिता की संतान का दर्जा मिलेगा। इस पूरी प्रक्रिया के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।

शिमला के उपायुक्त अनुपम कश्यप ने वीरवार को बताया कि राज्य सरकार के नए प्रावधानों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार या रिश्तेदारी में किसी बच्चे को गोद लेना चाहता है या सौतेले माता-पिता बच्चे को कानूनी रूप से अपनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उन्हें केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण की वेबसाइट पर आवेदन करना होगा। आवेदन के बाद आवश्यक दस्तावेजों की जांच और सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिला दंडाधिकारी दत्तक ग्रहण प्रमाणपत्र जारी करेंगे।

उन्होंने कहा कि अब तक कई परिवारों में रिश्तेदारी के आधार पर बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए बच्चों को गोद ले लिया जाता था। बाद में उत्तराधिकार, अभिभावकत्व और अन्य कानूनी मामलों में कठिनाइयां सामने आती थीं। नई व्यवस्था से दत्तक माता-पिता को कानूनी अधिकार मिलेंगे और बच्चे के अधिकार भी पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे।

उपायुक्त ने समाज के सक्षम और समृद्ध लोगों से भी अपील की कि वे शिशु गृह और बाल आश्रमों में रह रहे बच्चों को गोद लेने के लिए आगे आएं।

उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार के प्रयासों से इस दिशा में सकारात्मक परिणाम मिले हैं। 20 दिसंबर 2022 से एक सितंबर 2025 तक 'चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट' योजना के तहत 25 बच्चों को दत्तक माता-पिता मिल चुके हैं। उनका कहना था कि हर बच्चे को सुरक्षित पारिवारिक वातावरण और बेहतर भविष्य मिलना चाहिए।

जिला कार्यक्रम अधिकारी ममता पॉल ने बताया कि बच्चा गोद लेने के लिए आवेदन करने वाले अभिभावकों का चयन निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर किया जाता है। पात्र अभ्यर्थियों को मेरिट के अनुसार दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। उन्होंने कहा कि रिश्तेदारी में दत्तक ग्रहण के मामलों में भी जैविक माता-पिता या वैध अभिभावक की सहमति, आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन और सभी कानूनी शर्तें पूरी करना जरूरी है। यदि बच्चा पांच वर्ष या उससे अधिक आयु का है तो उसकी सहमति भी ली जाती है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद बच्चे को दत्तक माता-पिता की संतान के समान सभी कानूनी अधिकार मिलते हैं, जिनमें शिक्षा, पालन-पोषण, उत्तराधिकार और अन्य वैधानिक अधिकार शामिल हैं।

सौतेले माता-पिता द्वारा दत्तक ग्रहण के मामलों में भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी। यदि किसी बच्चे के जैविक माता या पिता के पुनर्विवाह के बाद सौतेले माता या पिता उसे गोद लेना चाहते हैं, तो संबंधित जैविक अभिभावक की सहमति, दस्तावेजों का सत्यापन और अन्य कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी। सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी मिलने के बाद ही बच्चा कानूनी रूप से सौतेले माता-पिता की संतान माना जाएगा और उसे सभी वैधानिक अधिकार प्राप्त होंगे।

जिला बाल संरक्षण अधिकारी इंदु शर्मा ने बताया कि भारत में भारतीय नागरिकों के साथ-साथ एनआरआई और विदेशी नागरिक भी निर्धारित नियमों के अनुसार बच्चा गोद ले सकते हैं। विवाहित दंपती, एकल अभिभावक और पात्र दंपती आवेदन कर सकते हैं। विवाहित दंपती के लिए विवाह को कम से कम दो वर्ष होना चाहिए। दत्तक माता-पिता का स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और अन्य पात्रता शर्तों की जांच की जाती है। आवेदन के साथ पहचान पत्र, आय प्रमाण, आयकर रिटर्न, मेडिकल प्रमाणपत्र, विवाह प्रमाणपत्र या अन्य आवश्यक दस्तावेज जमा करने होते हैं। उन्होंने बताया कि भारत में दत्तक ग्रहण की पूरी प्रक्रिया किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 तथा संबंधित नियमों के तहत पूरी की जाती है और इसकी निगरानी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण करता है। हिमाचल प्रदेश में स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी के माध्यम से यह पूरी प्रक्रिया संचालित की जाती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा