रंगमंच: मनुष्य के भीतर छिपे अकेलेपन, स्मृतियों, पछतावों और संबंधों को तलाशता नाटक बलि और शंभू
मंडी, 11 जून (हि.स.)। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला, हिमाचल सांस्कृतिक शोध संस्थान व रंगमंडल के संयुक्त तत्वधान में आयोजित 40 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के समापन अवसर पर प्रभावशाली नाटक की प्रस्तुति दी गई। नाट्य कार्यशाला की प्रस्तुति के रूप में नाट्य प्रस्तुति बलि और शंभू का सतोहल नाट्य परिसर में सफल मंचन किया गया। मानव कौल द्वारा लिखित एवं सुरेश शर्मा के मार्गदर्शन में ज्योति पांडे ने इसे निर्देशित किया। जबकि इस प्रस्तुति का प्रबंध व मंच संचालन सीमा शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जिला पंचायत अधिकारी अंचित डोगरा उपस्थित रहे।
उन्होंने कार्यशाला में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र आवंटित किए इसके अतिरिक्त साहित्यकार गंगा राम राजी, प्रो. अनुपमा सिंह, साहित्यकार मुरारी शर्मा, डा. राकेश कपूर, नवनिर्वाचित पार्षद सरिता हांडा सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। यह नाटक केवल वृद्धाश्रम में रहने वाले दो बुज़ुर्ग व्यक्तियों की कहानी नहीं , बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अकेलेपन, स्मृतियों, पछतावों और संबंधों की आवश्यकता का अत्यंत संवेदनशील दस्तावेज़ है। जीवन के अंतिम पड़ाव में मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता किसी भौतिक वस्तु की नहीं, बल्कि ऐसे साथी की होती है जो उसे सुने, समझे और उसके अस्तित्व को स्वीकार करे।
निर्देशक ने नाटक को केवल यथार्थवादी कथा के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसके भीतर मौजूद भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक संसार को मंच पर साकार करने का प्रयास किया। नाटक के दो मुख्य पात्र—बलि और शंभू—जीवन को देखने के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बली कठिन परिस्थितियों में भी आशा और हास्य खोज लेता है, जबकि शंभू अपने अतीत और स्मृतियों के बोझ से दबा हुआ है। दोनों के बीच विकसित होती मित्रता यह संदेश देती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका मानवीय जुड़ाव है। यह प्रस्तुति वृद्धावस्था की त्रासदी का चित्रण भर नहीं, बल्कि जीवन, मित्रता, स्मृति और उम्मीद का उत्सव है। नाटक दर्शकों को अपने आसपास के लोगों, परिवार और स्वयं के जीवन से जुड़कर सोचने के लिए प्रेरित करता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा