अधूरी गारंटियों के बीच नए जिलों की कवायद, पहले वादों का हिसाब दे सरकार: प्रो. अनुपमा सिंह
मंडी, 16 अक्टूबर (हि.स.)। प्रो. अनुपमा सिंह ने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और विकास खंडों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित किए जाने के बाद प्रदेश में नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। उन्होंने कहा कि सरकार को किसी भी नई घोषणा से पहले प्रदेश की आर्थिक स्थिति, जनता की बुनियादी आवश्यकताओं और चुनाव के समय किए गए वादों की पूर्ति पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही केवल नई योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं होती, बल्कि जनता से किए गए वादों को निर्धारित समय में पूरा करना भी उसकी जिम्मेदारी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब चुनावी गारंटियों की पूर्ति को लेकर जनता के मन में प्रश्न हैं, तो नए जिलों के गठन की कवायद को सरकार की प्राथमिकता क्यों बनाया जा रहा है।
प्रो. अनुपमा सिंह ने कहा कि नए जिले बनाने का विचार अपने आप में न तो गलत है और न ही इसे केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध कराना, सरकारी सेवाओं तक लोगों की पहुंच आसान बनाना और विकास को गति देना किसी भी सरकार के महत्वपूर्ण दायित्व हैं। लेकिन किसी भी नए जिले के गठन से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि इससे आम नागरिकों को क्या ठोस लाभ मिलेगा, प्रशासनिक व्यवस्था कितनी प्रभावी बनेगी और इस पर कितना अतिरिक्त वित्तीय व्यय आएगा।
उन्होंने कहा कि नए जिलों के गठन के लिए कार्यालयों, भवनों, कर्मचारियों, आधारभूत ढाँचे और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी। इसलिए सरकार को इस पूरी प्रक्रिया की लागत, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और अपेक्षित विकास परिणामों का आकलन जनता के सामने रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि चुनाव के दौरान किए गए वादों की वर्तमान स्थिति क्या है और उन्हें पूरा करने के लिए सरकार के पास क्या समयबद्ध कार्ययोजना है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक घोषणाओं से अधिक महत्वपूर्ण उनका धरातल पर क्रियान्वयन है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा