20 साल बाद पैरा नियमित लेक्चररों को वेतन निर्धारण में राहत
शिमला, 07 अक्टूबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में पैरा नियमित लेक्चररों के वेतन निर्धारण को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शिक्षा निदेशालय ने संबंधित पैरा नियमित लेक्चररों का वेतन न्यायालय के निर्देश के अनुसार तय करने के आदेश जारी किए हैं। शिक्षा निदेशालय ने जारी आदेश में वेतन निर्धारण कर इसकी प्रविष्टि संबंधित कर्मचारियों की सेवा पुस्तिका में करने के निर्देश दिए हैं।
आदेश के अनुसार संबंधित लेक्चररों का वेतन 12,090 रुपये मूल वेतन और 4,200 रुपये ग्रेड पे के आधार पर तय किया जाएगा। इस तरह कुल वेतनमान 16,290 रुपये बनता है। यह मामला सुनीता पांडेय बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार से जुड़ा है। पैरा नियमित अध्यापक संघ के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेश से खासकर उन पैरा नियमित प्रवक्ताओं को राहत मिली है, जिन्हें वर्ष 2012 के बाद नियमित किया गया था।
संघ के अनुसार यह मामला सुरेश चंद हीर मामले में स्थापित न्याय सिद्धांत से भी जुड़ा है। संगठन का कहना है कि 1 अक्टूबर, 2012 के बाद नियमित हुए संबंधित प्रवक्ताओं के लिए यह आदेश महत्वपूर्ण है। संघ के मुताबिक वर्ष 2003 में पैरा शिक्षक नीति के तहत कई लेक्चररों की नियुक्ति हुई थी। बाद में इन्हें नियमित किया गया।
संघ का आरोप है कि नियमितीकरण के बाद इन लेक्चररों का वेतन 10,300 रुपये मूल वेतन और 4,200 रुपये ग्रेड पे के आधार पर तय किया गया था। संगठन के अनुसार वर्ष 2012 के भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के तहत संबंधित कर्मचारियों का मूल वेतन 12,090 रुपये और ग्रेड पे 4,200 रुपये होना चाहिए था। इसी वेतन निर्धारण को लेकर लंबे समय से विवाद और कानूनी लड़ाई चल रही थी।
पैरा नियमित अध्यापक संघ ने उच्च न्यायालय के आदेश और शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी वेतन निर्धारण आदेश को पूरे संवर्ग के लिए राहत बताया है। संघ ने कहा कि यह कानूनी लड़ाई सुनीता पांडेय और अन्य कर्मचारियों ने लड़ी, लेकिन इसका लाभ सभी संबंधित पैरा नियमित शिक्षकों को मिलेगा। संगठन ने इसे करीब 20 साल से चले आ रहे संघर्ष के बाद मिली जीत बताया है।
संघ ने कहा कि पैरा नियमित अध्यापकों से जुड़े अभी कई अन्य मामले उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। इनमें पेंशन और सेवा लाभ, वेतनवृद्धि, वरिष्ठता और वर्ष 2012 में हुए नियमितीकरण से जुड़े मामले शामिल हैं। संगठन के अनुसार इन मामलों की सुनवाई उच्च न्यायालय की खंडपीठ में चल रही है और इन मामलों में भी पैरवी की जा रही है।
इस मामले में शिक्षा विभाग की ओर से 10 अक्टूबर 2016 को जारी किया गया रिकवरी आदेश भी उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा