हिमाचल सहित पहाड़ी राज्यो में सूख रहे जलस्त्रोत, सिकंदर कुमार ने संसद में उठाया मामला
शिमला, 05 फ़रवरी (हि.स.)। राज्यसभा सांसद और भाजपा के प्रदेश महामंत्री डॉ. सिकंदर कुमार ने गुरूवार को राज्यसभा में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के कई पहाड़ी राज्यों में मीठे पानी के घटते स्रोतों का मुद्दा उठाते हुए इसे गंभीर पर्यावरणीय संकट बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र, जिसे दक्षिण एशिया का जलस्तंभ कहा जाता है, तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहा है।
डॉ. सिकंदर कुमार ने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र के लगभग 50 प्रतिशत प्राकृतिक जल स्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं। जो क्षेत्र कभी मीठे पानी की प्रचुरता के लिए जाने जाते थे, वहां अब कई गांवों में लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। उन्होंने बताया कि कई जगहों पर महिलाओं को हर सुबह सूखते जल स्रोतों से पानी लाने के लिए एक घंटे से अधिक पैदल चलना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि यह संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, असंतुलित विकास गतिविधियां और पारिस्थितिक संतुलन पर बढ़ता दबाव भी बड़ी वजहें हैं। नीति आयोग की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि हिमालयी क्षेत्र के लगभग आधे झरने पहले ही सूख चुके हैं, जिससे इन संसाधनों पर निर्भर लोगों के सामने भविष्य में गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
डॉ. सिकंदर कुमार ने केंद्र सरकार से इस विषय पर गंभीरता से विचार करने और भारतीय हिमालयी क्षेत्र के सामरिक, पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व को ध्यान में रखते हुए ठोस नीतिगत कदम उठाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि जल स्रोतों के संरक्षण के लिए केवल सरकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि जमीनी स्तर पर जागरूकता बढ़ाकर लोगों को अल्पकालिक लाभ की बजाय पर्यावरणीय संधारणीयता को प्राथमिकता देनी होगी। उनके अनुसार समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए तो सूखते जल स्रोतों को बचाया जा सकता है और पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते जल संकट को कम किया जा सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा