साहित्यकार गंगाराम राजी के उपन्यास जोरावर सिंह का पंजाबी में अनुवाद

 






मंडी, 14 जुलाई (हि.स.)। किसी भी साहित्यिक कृति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है, कि उस कृति को पाठक किस रूप में लेते हैं। इसके अलावा किसी किताब का दूसरी भाषा में अनुवाद उसके पाठकों वृद्धि कर देता है। हिमाचल के सबसे अधिक उपन्यास लिखने वाले उपन्यासकार गंगाराम राजी जिन्हें हाल ही में देवभूमि लाईफटाइम अचीवर्स अवार्ड से नवाजा गया है। हाल ही में उनके उपन्यास जनरल जोरावर सिंह का पंजाबी में अनुवाद हुआ है। पंजाबी के मशहूर लिखारी प्रो. सुरजीत सिंह जज ने इस उपन्यास का अनुवाद किया है।

गंगाराम राजी के इसी उपन्यास का डोगरी और अंग्रेजी भाषा में भी अनुवाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुका है। पंजाबी में अनुदित इस पुस्तक का पाठकों ने बहुत स्वागत किया है। यही नहीं इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कुछ पाठक उन्हें ढूंढते हुए पंजाबी जनरल जोरावर सिंह को मान सम्मान देते हैं।

साहित्यकार गंगाराम राजी ने बताया कि पंजाब के लोग बहादुरी का नाम जनरल जोरावर सिंह को मानते आए हैं। उन्होंने बताया कि जब इस उपन्यास का अनुवाद पंजाबियों के हाथ में आया तो वे एक दूसरे से बात करते रहे और यह उपन्यास देखते ही देखते 10 प्रतिशत लोगों के पास पहुंच गया।

उन्होंने बताया कि यह उपन्यास पंजाबी के पाठक गुरजीवन सिंह के हाथ लगा। उन्होंने व्यस्त होने के बावजूद एक दिन में ही उपन्यास पूरा कर लिया। इसके बाद सीधे फोन पर गंगाराम राजी को बताया कि हम पंजाब के कुछ पाठक आपसे मिलने आ रहे हैं। वे निश्चित समय पर उनके घर सुंदरनगर स्थित राजी महल पहुंच गए। गंगाराम राजी और उनके मित्रों कृष्ण महादेविया, पवन चौहान, रत्नलाल शर्मा और सुरेंद्र मिश्रा ने इन पाठकों का स्वागत किया। गुरजीवन सिंह पंजाब के कोपरिटिव बैंक के चेयरमैंन हैं। उनसे साहित्य पर चर्चा हुई, बातचीत हुई जोरावर सिंह के बहादुरी के किस्सों का आदान प्रदान हुआ। यह भी बताया गया कि उस बहादुर आदमी के कारण ही लेह लद्दाख भारत का हिस्सा बना है। हम सब उस महान योद्धा को सलाम करते हैं। हिमाचल के साहित्य के क्षेत्र में यह पहली बार हुआ कि लेखक के पाठक उससे मिलने इतनी दूर से चले आए,उनसे मिलना एक सुखद अनुभव रहा।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा